सुबह-ए-बनारस और काशी करवट/करवत

सुबह-ए-बनारस और काशी करवट/करवत
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जब भगवान भास्कर मीलों का सफर तय कर अंधेरों को चीरते अपने सुनहरी अरनिमा से इतराती इठलाती गंगा की लहरों को चूमते हैं न तब घाटों का यह शहर… हाँ सही समझा आपने। बनारस…अहा ! यह निर्मल, निश्छल, विहंगम दृश्य मानो आपको अपने आत्मा से मिला देने वाला होता है।
मंदिरों में बजते घन्टियों, पंडितों द्वारा मंत्रोच्चार के साथ साथ विटप,छतनार के कांपते पत्तें, विहंगों की चहचहाहट की आवाजें मानो कोई मंत्रोच्चारण करते या कीर्तन गाते लगते हैं। पण्डित, पण्डों की झोली, साधू और संतो की टोली, फूलों वाली टोकरी और कहीं कहीं अघोरी बाबाओं की धुनी बेबाक,अजब-गजब मनोहारी यह दृश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ बनारस गंगा घाटों पर ही मिलते हैं। बनारस की यह छटा यहीं खत्म नहीं होती है। घाटों से इतर, ऊपर उठकर अगर हम थोड़े से ऊपर आ जाएं तो प्राचीनतम नगरी के दूसरे पहलूओं को सुन, देख, छू और महसूस कर सकते हैं।
संकरी,लंबी-लंबी गलियों में सांस लेते दरों-दीवारें, दुकानें, गलियों को छेके खड़े वीरभद्र जी (सांड), अंगीठी, सुलगते चुल्हे, चाय की कुल्हड़, उनमें से उठते गर्म सांसों सी धुएं, स्वादिष्ट खाने को मजबूर कर देने वाले पूरी-सब्जी, कचौड़ी, लौंगलता, रबड़ी, चाट पकौड़े, गोल-गप्पे, कटलेट, इडली डोसा, चटनी, इडली-पोड़ी,सैंडविच और न जाने क्या क्या लंबी फेहरिस्त है। जिसे न खाकर हम पछताने के कगार पर जरूर आ जाएंगे। इसलिए बनारस जाएं तो स्ट्रीट और गलियों में मिलने वाले खानों का लुत्फ जरूर से जरूर उठाएं। यह मेरी व्यक्तिगत सलाह है।
वैसे तो काशी की हर चीज अपने आप में ऐतिहासिक है। धरोहरों, संस्कृति और धर्म-कर्म को धारण किए हुए है। विस्मय की दुसाला ओढ़े हुए है, जिसके कण कण में शंकर और हवाओं में प्रेम का वास है। जो रग-रग में रागों का संचार करा दें। यह काशी किसी को भी अपने मोहपाश में बांध सकने में सक्षम है। एक बार आओ तो बार-बार आने की लालसा मन में लिए वापस लौटते हैं लोग।
अर्धचंद्राकार रुप में अस्सी घाटों को अपने किनारों में बसाहट देती गंगा अद्भुत, अलौकिक, और अविस्मरणीय है। वैसे तो हर-एक घाट की अपनी संस्कृति और कहानी है। यह सिर्फ घाटें नहीं अपितु विरासत है। घाटों पर बनी ऊंची-ऊंची सीढ़ियाँ और उनसे लगें असंख्य छोटी बड़ी मंदिरों का मंज़र तो देखते ही बनता है।
वैसे तो लगभग सभी मन्दिर सीढ़ियों के ऊपर बने हुए हैं।
लेकिन रामेश्वर महादेव मंदिर जो मणिकर्णिका घाट से कुछ कदम आगे अहिल्याबाई घाट में है, सीढ़ियों के नीचे बना हुआ है। इसे काशी करवट भी कहते हैं। वह इसलिए कि यह मन्दिर झुका हुआ है। लगेगा कि मन्दिर ने करवट बदली है। दूर से इसका झुकाव का तीरछापन साफ देखा जा सकता है।
आश्चर्य बहुत होगा कि, आखिर यह मन्दिर खड़ा कैसे है?
साथ में यह भी कि जब पीसा का मीनार विश्व धरोहर में शामिल है तो यह रामेश्वर महादेव मंदिर क्यों नहीं ?
पीसा का मीनार चार डिग्री झुका हुआ है और यह रामेश्वर महादेव मंदिर नौ डिग्री। अनेक कहानियों और पहेलियों में उलझा हुआ है यह अनोखा मंदिर।
पहली बार इस खुबसूरत शिवालय को देखकर हम भी नि:शब्द हो गए थे। विस्मय और आश्चर्य ने जैसे मेरे आंखों में कब्जा जमा लिया था। मन्दिर टेढ़ा होने के बावजूद भी कैसे वर्षों से खड़ा है ? क्यों यह सीधा नहीं हो सकता ? बहुत सारे अनगिनत सवालों को लादे अपने दोनों भुजाओं से मन्दिर को पकड़ने कीऔर ऊपर की ओर धकेलने की एक नाकाम अदना कोशिश बिना किसी के नज़र पड़े करती हूँ। हम वहाँ ३० दिसंबर २०२१ को गए थे तो उस समय मन्दिर की स्थिति यह थी कि सामने वाले मण्डप के स्तंभ आधे से ज्यादा धंसे हुए थे। मन्दिर के गर्भगृह और सामने वाले हिस्से में भी में स्लिट भरा होने के कारण हर तरफ़ से मन्दिर बंद बंद लगा। मन्दिर में स्लिट (बहुत महीन मिट्टी) शायद गंगा में बाढ़ आने से भर गई होगी। कुछ लोकल लोगों का कहना है मन्दिर में पूजा अर्चना होती है, तो कुछ कहते हैं नहीं। प्रायः गंगा का जलस्तर बढ़ने के कारण साल का आधे से ज्यादा वक्त यह रत्नेश्वर महादेव मंदिर डूबा ही रहता है। इसलिए नियमित पूजा अर्चना इसमें संभव नहीं ही होता है।
खैर … जो भी इसके पीछे कारण हो। मन्दिर अपने आप में ऐतिहासिक है और रोमांचित करता है। इस मन्दिर के इतिहास को लेकर कई प्रचलित कहानियाँ हैं। एक कहानी के अनुसार इसे मातृऋण मन्दिर भी कहा जाता है।
कहानी इस प्रकार है कि एक धनी ने अपनी माँ की प्रतिष्ठा में एक मंदिर काशी में गंगा घाट के किनारे बनवाया। बन जाने पर उस धनी ने अपनी मांँ को वहांँ बुला कर गर्वानुभूति से कहा देखो माँ, आज मैंने तुम्हारे लिए यह मन्दिर बना कर मातृऋण चुका दिया। इतना कहना ही था कि मन्दिर की नींव धंसने लगी और एक ओर झुक गया। तब माँ ने कहा… बेटा कितना भी धनवान क्यों न हो जाए वह माँ के ऋण से उऋण नहीं हो सकता।
शिवजी की करवट बदलने की, अहिल्याबाई होलकर की दासी की कहानी, बाढ़ और भूकंप की दास्तान काशी करवट से जुड़ी हुई है।
और भी कई किंवदंतियों से सराबोर है यह काशी करवट। गंगा में उफ़ान आने पर जलस्तर मन्दिर के शीर्ष पहुंच जाता है। मन्दिर हर हमेशा जलमग्न हो जाता है। जलस्तर कम होते ही मन्दिर फिर से दिखने भी लगता है। वर्षों से यह सिलसिला जारी है। पर्यटक आते हैं जाते हैं और काशी करवट सबके कौतुहल का विषय बनता है ….
ठीक दस कदम काशी करवट से आगे हमने देखा एक और मन्दिर गंगाजल में पूरी तरह से समाहित है। साफ दिखाई दे रहा था कि मन्दिर पूरी तरह से डूब चुका है। उपर का शीर्ष हिस्सा खुल्ली आँखों से देखा जा सकता है। जाने ऐसी कितने ही मन्दिर जलमग्न हो गए होंगे ?…
उसी समय मेरी नज़र पास मणिकर्णिका से उठते धुएं और आग की लपटों पर पड़ती है। उस दिव्य महाश्मशान को देख अनायास ही मेरा खोजी मन पल भर में ही शान्त हो जाता है। शायद उथल-पुथल से भरी सबकी ज़िन्दगी का लब्बोलुआब यही आखिर पड़ाव है। हाँ…अब बस टकटकी और मौन साथ थे मेरे।
क्रमशः •••
-अपर्णा विश्वनाथ

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