माकूल जवाब

किसे खबर थी कि मन्द मन्द बहती फाग के बयार में स्याह फिज़ा में इस कदर घुलेगी कि रंग, बेरंग और मंजर कुछ यूं धुंआ धुंआ होगा कि लोग साँसों के लिए एक युद्ध खुद के साँसों से खुद को बचाने के लिए जद्दोजहद करते…बेबस उदास कातर दृष्टि से लोकतंत्र की तमाम चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था को किसी सलीब की तरह अपने कन्धों ढो़ते अंतिम विश्रांति की ओर चले जाएंगे। किसने सोचा था ?
दोनों सूरत हार या जीत का सामना करना पड़ेगा!
किसके साँस की मीटर कब थम जाए ? पता नहीं।
समय दौर गुजर जाता है यह भी बीत जाएगा…
समय का पहिया एक दिन जरूर थक कर सो जाएगा…
हाँ ! लेकिन …
निंशा छोड़ जाएगा वह सब कुछ जो होगा एक न कभी भूलने वाला बदसूरत भयावह इतिहास।
अपनों का अपनों को खोने का मंज़र आँखों में कैद वह अंतिम विश्रांति के लिए … जगह पाने के लिए, चिता स्थल पर भी संघर्ष और वह सब कुछ
ताउम्र…न भूलने वाला।
झंझरी से हवा नही आ रही तो घर के झाले साफ कर दिए जाते हैं शुद्ध हवा आने लगती है। फेफड़ों में जो झाला पड़ रहा है वह कैसे साफ हो पाएगा ।
सवाल बहुत बड़ा और कठिन नहीं है पर हाँ कोई माकूल जवाब भी तो नहीं है।

-अपर्णा विश्वनाथ

नाउम्मीदी जब हद पार कर जाती है तब कोई न कोई उम्मीद की किरण परमात्मा जरूर देता है । बस आप दुआ प्रार्थना अरदास करते रहिए। आपकी जिंदगी बचाने कोई न कोई नानक जरूर आएंगे।बस एक दूसरे को थामे रखें किसी का साथ न छोड़ें इस महामारी की विकट परिस्थिति में। कल का पता नहीं आज में जिएं, नि:स्वार्थ भाव से इस महामारी के समय में किसी एक की भी सहायता किजीए इससे बड़ा कोई धर्म नहीं…

वसंतोत्सव की अशेष शुभकामनाएं सभी को✍️📝 🌼🌺🌸🍁🦋🌾🍂☘️🍃🌹🎻



हे शब्दों के धनी, स्वयंभू मनु
लिखो,
कि लोग जुड़े
ना कि लोग लड़ें••

लिखो,
कि भटके को राह दिखाएं
ना कि राह भटक जाएं ••

लिखो,
कि कुछ चेहरे मुस्कुराएं
ना कि तुम्हें ठुकुराएं ••

लिखो,
कि तुम हो स्मरहर
ना कि स्मर ••

लिखो,
कि मदन ने वसंतोत्सव है खेला
पलास ने रंग पंचमी पर उड़ेला ••

लिखो,
कि अपर्ण से पर्ण तक की छंदमात्रा
कुसुमाकर ऋतुराज की यात्रा ••

-अपर्णा विश्वनाथ🍁

स्मृतियाँ

सुनो !
स्मृतियों की यह जो
आभासी अंकगणित
है ना,
है तो थोड़ी सी
अज़ीब
कभी घटती
तो कभी जमती ••
संघटन विघटन
का सिलसिला
छिड़क जाता
एकबार फिर
हरा-गुलाबी रंग और
लहलहा उठता
ऊसर मन ••
और जड़
चेतन हो
शून्यता से
कोसों दूर
गमन करने लगती
साँसों की
वक्र रेखा में ••
और हाँ सुनो !
जिस दिन
जाएंगी शुन्य
वह स्मृतियाँ
उस दिन जाएगी
तब्दील वह
वक्र रेखा
सरल सीधी रेखा में •••

-अपर्णा विश्वनाथ🍁

समय की रेत पर,
क्या निशाँ छोड़ गए…
कि स्मृतियों में सबके,
क्या बीज बो गए…
कि सलीके का लबादा
ओढ़ ग़दर, तुम मचा गए…
गोया दोतरफा किरदार में
सब अस्त व्यस्त कर गए…
दिल्ली फतह कर गए,
कि दिलों से उतर गए…
क्या किला चढ़ गए,
क्या इतिहास गढ़ गए…?

-अपर्णा विश्वनाथ🍁

यह कैसे पात्र हो तुम ?

तुम गहरे भावों को
शब्दों में
तलाशते
बारिकियों से तराशते
फिर छूते उन्हें
नर्म गुलाबी हाथों से
रुप देते
उन शब्दों को
और फिर बड़े
नज़ाकत से
एहसासों की
फसल उगाही
करते हुए
रच देते हो
सबसे सुंदर कविताएं
और साहित्य की अनसुनी
विधाओं में रचनाएं
एक उफान
एक सैलाब के साथ
बिना आहट के
कमान से
छोड़ते हो तीर
जो,
बयां करती किसी
स्त्री की ख़ूबसूरती ..

तुम एक
विशाल विस्तृत अशेष
अछोर
शब्दकोश हो
कि संभव है
हर स्त्री
प्रेम कर बैठे
उन शब्दों के
सैलाब से
उन शब्दों के
मुलायमियत से
उस स्याह से भी
जिससे तुम
खेलते हो
होली और
कुछ पन्ने मुस्कुरा
उठते हैं ..

मगर !
सब खोखलापन
बनावटीपन
दोहरी मानसिकता का
आवरण ओढ़े
आत्माविहीन
तुम,
एक बहेलिया
जो,
वर्णमाला की
जाल बुन
क़ैद करते हो
किसी की संवेदनाओं को
जीर्ण-शीर्ण करते
और खेलते
उनके जज़्बातों से
और फिर
विलुप्त हो जाते हो
एक दिन
किसी विलुप्त हुए
भाषा की तरह..

सुनो
हे कलियुगी कन्दर्प !
कितने संकीर्ण हो तुम
कैसे जी
पाते हो ?
सोच इतनी
कसाद तुम्हारी
यह कैसे पात्र हो तुम ?
अंदर से कुछ
बाहर से कुछ और
क्यों हो तुम ?

-अपर्णा विश्वनाथ🍁