तुम लिखना

सुनो पुष्पधन्वा !
निर्माण करना पाषाणी सतह का
और फिर करना यात्रा
उन सतहों पर
बख़ूबी आता है तुम्हें
क्योंकि, बहुत गुमान है तुम्हें
अपनी वर्णमाला पर, इसलिए
तुम लिखना
उस पाषाण पर, जैसे गिरनार शिलालेख
ब्राह्मी लिपि में ।

सुनो पुष्पधन्वा !
क्योंकि मौन में भी एक चीत्कार है
इसलिए एक कविता लिखो ।

तुम लिखना,
कि कैसे भीड़ वाले शहर में भी अक्सर
क्यों रह जाते हो तुम अकेले
लिखना,
कि कैसे समर्पण में छुपा लेते हो कपट
तुम लिखना,
कि मेले के शोर में भी
तुम्हारे हिस्से आती है क्यों सिर्फ़ ख़ामोशी ही
लिखना,
कि क्यों दीवारों से बातें करके रोते हो अक्सर
तुम लिखना,
कि क्यों तुम किसी और की पीठ पर
एहसासों की फसल उगाही करते हो ।

सफलताएँ तो हर कोई लिखता है, पुष्पधनवा
तुम लिखना,
अपनी विफलताओं का पुलिंदा
लिखना,
अपनी पराजय कुंठाओं ,
अपने षड्यंत्रों को
अपने पुरुषत्व के विचारों को,
और लिखना,
अपनी नाकामियों के किस्से भी
बहुत ही निष्ठापूर्वक…
जो,
असंपादित हो
ताकि इतिहास पढ़ सके
तुम्हारी
पराजय भी
तुम्हारे पुरुषत्व के साथ ही ।

-अपर्णा विश्वनाथ 🍁