रिश्तें******



अलसुबह पड़ोस की कान्ता आंटी के चिल्लाने की आवाज से वातावरण और मोहल्ला गुंजायमान था। बच्चें, स्कूल जाने, पेरेंट्स अॉटो,रिक्शा, बस तक बच्चों को छोड़ने, सफाई कर्मचारी रास्ता घाट बुहारने में, अखबार वाला अखबार बाँटने में, सभी अपने में उलझे। सुबह सुबह की आपाधापी में किसे फुर्सत।
लेकिन मुझ से रहा न गया।
क्या हुआ आंटी?
क्यों कपड़े धो रहे हैं? शांताबाई नहीं आई क्या?
अरे देखो ना आज पूरे चार दिन हो गए हैं।
— कोई खबर भिजवाई?
कहाँ। कोई खबर नहीं। ऊपर से जब अंकल उसके घर जाते हैं, तो दरवाजा भी नहीं खोलती है। पन्द्रह साल से काम कर रही थी। देखो कैसे बिन बताए। मुंह में तमाचा मारने जैसा।
ओह! यह तो हद्द है आंटी।
है ही। अब बताओ महीने के चार पांच दिन तो मैं यहाँ रहती ही नहीं हूँ। पता तो है तुम्हें। बेटों के यहाँ चली जाती हूँ। आती हूँ तो इसको भी आना चाहिए ना काम करने।
पैसे बढ़ा दो आंटी।
अरे! बढ़ा दूँगी।
जो भी बात है सामने से बोलना चाहिए ना।
फोन पर भी बात नहीं करती। जब बताएगी नहीं तो मैं क्या समझूँगी। बहुत घमंड हो गया है इसे। जानती तो हो। तुम्हें भी कैसे आडा तिरछा जवाब देती थी।
हम्म् सही बात है आंटी।
हाँ रे। अब मुझसे नहीं हो पाता है काम। एक तो वात के मारे पूरे शरीर में दर्द रहता है।
हम्म् …
देखो आंटी फिर कोई दूसरी।
मैं वापस अपने घर काम में व्यस्त हो गई। सोचते हुए कि
सत्तर- पच्चहत्तर की उम्र हो गई है अंकल आंटी की।
दूसरे दिन — फिर वही। आंटी काम करते करते अंकल पर चिल्लाती जाती। बहरा हो गया है। माँगती हूँ नीला साबून तो लाता है हरा साबून। अपनी काम की खीझ उतारती।
आंटी आई क्या कोई खबर शांताबाई की?
आंटी पसीने में लथपथ।
गुस्से में — नहीं आई।
रख लूंँगी दूसरी। पच्चहत्तर मिल जाएंगे।
फिर अंकल पर चिल्लाते हुए। अरे इसके चलते। ऐ कहीं टिकता ही नहीं है। वरना मैं तो चले जाऊँ बेटों के पास रहने। मुझसे नहीं होता अब इस उम्र में इतने बड़े घर का काम अकेले करना। अब बताओ दो-दो बहुओं के होते मुझे काम करना पड़ रहा है। सोचना चाहिए ना बहुओं को भी।
तो आंटी जब तक नई कामवाली नहीं मिलती बेटों के यहाँ चली जाइए ना।
आंटी — मुझे तो वहाँ अच्छा लगता है।
बैठ के सिर्फ खाओ। खाना बनाने वाली भी है वहाँ। लेकिन हमेशा के लिए रहूँगी तो वो प्यार और आदर थोड़े ना मिलेगा।
दो दिन बाद —
पता चला एक नई कामवाली से पैसों की बातचीत हुई और तय हुआ अगले दिन से सुबह आठ बजे से आएगी।
अगले दिन सुबह — समय दस बजे।
नई कामवाली प्रवेश करती है। लेकिन तब तक आंटी बर्तन, कपड़े और आंगन साफ कर चुकी होती हैं।
यह टाइम है आने का? ऐसा कैसे चलेगा?
नहीं करवाना तुमसे काम। आठ बजे का कहा था। दस से ऊपर हो गया है।
तभी दूधवाला आता है। आंटी सारा गुस्सा उस पर भी उतारती है। दूध नहीं पानी देते हो। नहीं चाहिए अब। बंद करवा दूंगी। तुम्हारे बाप को भेज। उसी से बात करूंगी। दूधवाले कोई अठारह उन्नीस साल का लड़का है। आखिर उसे भी गुस्सा आता है। कोई नहीं टिकेगा तुम्हारे यहाँ। अच्छा हुआ कामवाली चली गई।
लेकिन अंकल आंटी सब पर भारी। इस उम्र में भी इतनी बुलंद आवाज और पुष्पा कभी झुकेगा नहीं वाले भड़कीले तेवर। आग में घी का काम करते हैं।
तू तू मैं मैं में दोनों के बीच मामला और भड़क उठा।
पास में होने के नाते मैं आंटी को शांत करने की कोशिश करती हूँ। कामवाली को बोलती हूँ दीदी जल्दी आ जाया करो। लेकिन मामला नहीं सलटा।
कुछ दिनों बाद एक और नई कामवाली फिक्स हुई। मुझे अच्छा लगा। चलो अंकल आंटी को अब थोड़ा आराम रहेगा।
लेकिन एक बात कचोटती है मुझे कि समस्या का हल हम अपनों के पास नहीं ढूंढते हैं। समाजिक प्राणी होने के नाते हमें अपने कठिन समय में अपने आसपास के लोगों से मानसिक बल मिल जाता है। अच्छी बात है।

जैसे कान्ता आंटी को। जिन्हें अपने मजबूत आर्थिक स्थिति का बड़ा दंभ है। उन्हें दंभ है कि पैसे से सबकुछ खरीदा जा सकता है। कहती हैं पैसा फेंको तमाशा देखो। बहुत काम वाले मिल जाएंगे। लेकिन क्या अंकल आंटी को इस उम्र में अपने बच्चों और पोतों-पोतियों के पास नहीं रहना चाहिए। बहुओं की हल्की फुल्की घरकामों में मदद करते हंसते गाते समय काटना नहीं चाहिए?
आज एक कान्ता आंटी नहीं, ऐसी कितनी ही कान्ता आंटियाँ हैं जिनके बेटे बहू, वृद्ध माता-पिता से अलग रहते हैं।
क्योंकि बेटे-बहू ही अलग घर बसाते हैं तो समाज सारा दोष उन पर ही मढ़ देता है। अपने वृद्ध मातापिता को छोड़ दिया है। बहू ध्यान नहीं देती है। बेचारे इस बुढ़ापा में अकेले रह गए हैं। वगैरह वगैरह। जितनी मुंह उतनी बातें।
मैं सोचते रह गई कि बातों का क्या। कोई टैक्स थोड़े ना लगता है। जितनी करवा लो।
फिर टीवी सिरियल्स ने भी यहाँ आग में घी का काम किया। संवेदनाओं और भावनाओं को ताक पर रख सास और बहु के रिश्ते को बाजारीकरण कर तरह तरह से दर्शकों के मनोरंजन के लिए परोसा गया है।
मनोरंजन तो हुआ, लेकिन साथ ही रिश्तों में एक अनचाहा अवसाद, रिश्तों में असुरक्षा का भाव भी साथ साथ पनपता गया।
लेकिन आप कहेंगे क्यों अपनी बुद्धि घास चरने गई है क्या?
नहीं गई।
लेकिन इसे भी नकारा नहीं जा सकता कि हम अपने परिवेश से प्रभावित होते हैं और आजकल अमूमन सीरियल्स हमारे परिवेश का ही एक हिस्सा हैं इसे भी हम झूठला नहीं सकते हैं।
दोषी कौन- क्या सिर्फ बहुएँ ?
अब जमीनी हकीकत यह है कि हर हमेशा बेटे बहू ही दोषी नहीं है। बुजुर्गो के कुछ ज़िद्दीपन, रूढ़ीवादी परम्परा और दकियानूसी सोच ने सास बहू के रिश्तों में तल्खों को जन्म दिया।
हमें दोनों पक्षों के नजरिए से देखने की जरूरत है। मैंने ठानी की कान्ता आंटी से बात करूंगी।
पूछूंँगीं वजह। बेटे बहुओं के अलग होने की।
अगर आप अपने आसपास में रह रहीं ऐसे ही कान्ता आंटियों से अलगाव का कारण पूछेंगे तो आप भी पाएंगे कि बात बहुत ही मामूली सी है :-

* ज्यादातर आजकल हर ससुराल वालों को अव्वल तो लड़की पढ़ी लिखी नौकरी वाली चाहिए। अच्छी बात है। इसमें बुरा कुछ भी नहीं। लेकिन क्या बहू को भी उतनी ही सुविधाएंँ मिलती है जितना कि कामकाजी बेटों को। अधिकतर आप पाएंगे नहीं। इस बात पर कोई सुनवाई भी नहीं बहुओं की।
* चूंकि लड़की शादी के बाद ससुराल में रहती है। घर या तो ससुर जी का बनाया हुआ होता है या फिर पुश्तैनी। लेकिन आए दिन सास या ससुर की धमकी या उलाहना कि तुम दहेज़ में घर नहीं लाई हो कि, जैसा तुम चाहो वैसा करो। घर हमारा है तो हमारे कहे अनुसार रहो वरना चलते बनो। क्या बहुओं को अपने मन मुताबिक अपने कमरे को कुछ सजाने संवारने का हक़ नहीं है। उनका भी आत्मसम्मान है। जिसे ठेस पहुंचाने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए।
* घर का राशन जैसे – दाल, चावल, तेल, साबून, टूथपेस्ट और भी सारे सामान। सासू मांँ के कहे मुताबिक। हमारे यहाँ ऐसा ही लाते हैं। सालों से। तुम आज आई हो। कुछ बदलेगा नहीं। ज़रा सा सोचने की भी जेहमत नहीं उठाते कि बहू होने के पहले बहू मायके में बेटी थी। वर्षों से किसी और टेस्ट, अदब से पली बढ़ी है। अचानक बदलाव में ढलने में कभी कभी समय लगता है।
* शाम के वक्त नौकरी करके आने के बाद आपको चाय पीने का मन करे तो भी आप बिना पूछे नहीं पी सकते। सासू मांँ से बिना इजाजत के चाय काॅफी बनाने की आजादी नहीं। कैसी मानसिकता है यह। कभी परंपरा के नाम पर, कभी कुछ छुआछूत प्रथा के नाम पर, या फिर और दूसरे कारण।
* जॉब के बाद थके मांदे घर आने के बाद हर किसी को शांति भरा माहौल और अपना एक स्पेस चाहिए होता है। जो बेटों पर तो लागू होता है लेकिन बहुओं पर नहीं।
क्यों बहू कोई मशीन है। क्या वह थकती नहीं है। क्या घर आने पर एक ग्लास पानी और चाय कोई पूछता है उसे। कोई नहीं। बात छोटी सी है। लेकिन यह मतभेद, वैचारिक विभिन्नताएं ही कलह का कारण बनती हैं और अशांति उत्पन्न होने के कारणों को जन्म देता है।
* अधिकतर घरों में सुबह से लेकर रात तक यही सुनने को मिलेगा कि नौकरी कर रही है तो क्या घर के काम और तुम्हारे बच्चों को मैं नहीं देख सकती।
अधिकतर मामलों में बहू के घर में आते ही सास अपने हाथ खड़े कर देती है। या फिर बहू द्वारा किए गए कामों से नाखुश। बात बात में ताना कि यही सिखाया है तुम्हारे माँ-बाप ने।
* कान्ता आंटी कहती है मेरे परमिशन के बिना मेरे बहुओं को बेडरूम में जाने की इजाजत नहीं थी। अब सोचिए कि बहू ने हो गई कोई बंधुवा मजदूर हो गई।
कान्ता आंटी के यहाँ ऐसे ही छोटी मोटी झिकझिक ने विकराल रूप धारण कर लिया था। ऊपर से अंकल आंटी की चिल्ला चिखकर बात करने की आदत।
लेकिन प्रायः सुनने में यह आता है कि बहू बिल्कुल एडजस्ट नहीं करती।
अब सोचने वाली बात है कि क्या बहुएं इंसान नहीं है?

मैंने कहा तो आंटी आप थोड़ा एडजस्ट क्यों नहीं करती। आपकी बहुएं नौकरीशुदा हैं। आपके बेटों को आर्थिक मदद करने के लिए ही तो काम करती है ना। तो क्या थोड़ा सा शारीरिक सहायता, मानसिक सहायता,अपनापन और थोड़ा सा प्यार अपने बहुओं को आप नहीं दे सकती हैं।
कान्ता आंटी — ना बाबा मेरे से तो नहीं हो पाएगा।
क्या अब भी केवल बहुएंँ ही ग़लत हैं और अलगाव का कारण है? सवाल फिर अपनी जगह अडिग है। ऐ कैसा रिश्ता है?

-अपर्णा विश्वनाथ

आषाढ़_मासम् और #नखरंजनी/ #गोरिंटाकू

#आषाढ़_मासम् और #नखरंजनी/ #गोरिंटाकू
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भारतवर्ष परंपराओं का देश है। परंपराओं की दुशाला लपेटे वर्ष के बारह महीने अपने में महत्वपूर्ण है। हिन्दू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के बाद आषाढ़ मास शुरू होता है। सूर्य का कर्कटक राशि में संक्रमण इसी महीने में होता है जिसे दक्षिणायन की शुरुआत माना जाता है।
भारत देश के कई राज्यों में खासकर दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश और कर्नाटका में विशेष परंपरा और रीति-रिवाजों के संदर्भ में आषाढ़ मास काफी महत्वपूर्ण है। तो पढ़िए और जानिए आप भी।

एक प्रचलित और दिलचस्प कहावत भी है आंध्र प्रदेश में कि आषाढ़ मास में गोरिंटाकू(मेहंदी) अपने ससुराल चली जाती है।
लेकिन असल में एक महीना (पूरा आषाढ़ मास) नवविवाहिताओं को अपने मायके जाने और वहीं रहने की परंपरा है क्योंकि पूरे आषाढ़ मास सास-बहू (नवविवाहित) एक चौखट नहीं लांघ सकते हैं। अब इसका क्या तुक है पता नहीं।

फिर इस आषाढ़ मास में महिलाओं के गोरिंटाकू (मेहंदी) लगाने का चलन है। कम से कम एक बार तो लगाना जरूरी है। वो भी आकू मतलब पत्ते वाली मेहंदी। समृद्ध वैवाहिक जीवन और सुहाग के लिए। मेहंदी सुहाग का प्रतीक माना जाता है।
बेवजह कुछ भी नहीं है। हमारी हर परंपरा सांइटिफिक भी है।
इस तरह की हर बात, बचपन से लेकर आज तक मेरी माँ मुझे प्रूफ और रीज़न के साथ बताती आई है।

तो, माँ जहाँ तक संभव हो पत्ते वाली मेहंदी सिलबट्टे (grinding stone गोल गोल घुमाने वाला ) में पीसती थी। एक हाथ पीसते हुए ही लाल नारंगी हो जाता था। एक हाथ सादा बचाकर रखती ताकि चंदा मामा और छोटे बिंदुओं से हाथ भर सकें।
…लगा लेना। खासकर नाखूनों में भी, कहकर माँ हमलोगों को भी रात में एक गोला मेहंदी का दे देती। पैर की तली में भी लगाने की हिदायत देती‌।
मैं झिकझिक करती। नहीं लगाउंगी कहती। तब माँ साइंटिफिक रीज़न देती —
आयुर्वेदिक औषधि के रूप में
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* लगभग तीन-चार महीने कड़क गर्मी को झेलते हुए हमारा शरीर भी काफी उष्ण हो जाता है। हाथ-पैर की तली में मेहंदी लगाने से शरीर की उष्णता कम होती है। क्योंकि मेहंदी की तासीर ठंडी होती है। उष्णता खींच लेती है।

* ठंडक एहसास और मेहंदी की खुशबू। अहा!

* आषाढ़ मास मतलब बारिश की शुरुआत। जलवायु में अत्याधिक परिवर्तन होता है। पहले कच्चे पक्के मकान और महिलाओं का सारा दिन रसोईघर और पानी के कामों में बीतता था। हाथ और पैरों में पानी से फंगल इन्फेक्शन (जिसे साधारण भाषा में पानी लग जाना या पानी खा जाना कहते हैं) की समस्या आम होती थी।
मेहंदी एक आयुर्वेदिक औषधि है। मेहंदी का रस त्वाचा के अंदर जाकर प्राकृतिक रूप से एक एंटीबायोटिक का काम करती है। साथ में नाखूनों को खराब होने से,उसमें पस भरने से भी बचाती है। आषाढ़ महीने में मेहंदी की औषधीय गुण बढ़ जाती है।
प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन
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* मेहंदी का संस्कृत नाम नखरंजनी है। नाम में ही सब कुछ निहित है। नख – नाखून, रंजनी – रंगने वाला। यह प्रकृतिप्रदत्त नेलपॉलिश है। वो भी बिना साइड इफैक्ट के।
तो उन दिनों जब आर्टीफिशियल नेलपॉलिश नहीं हुआ करते थे तो महिलाएं नखरंजनी से ही अपने नाखूनों को रंगती थी।
* मेहंदी के रंग से हाथों और पैरों की खूबसूरती तो देखते ही बनती है।
* नाखूनों के साथ बालों में रंगने का प्राकृतिक संसाधन है मेहंदी।
* मेहंदी एक अच्छी हेयर कंडीशनर भी है।

पहले के समय में पत्ते मेहंदी पीस कर बाँटने की भी परंपरा थी जो आज भी दक्षिण भारत में चलन में है। माँ बताती है कि कैसे बचपन में उनके हाथ मेहंदी बांँटते बांँटते आधी रंग जाया करती थी।

तब रहीम का यह दोहा याद आता है मुझे —

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥

-अपर्णा विश्वनाथ

एक कदम प्लास्टिक मुक्त भारत की ओर

#singleuseplasticban
#singleuseplasticfree
#एक_कदम_प्लास्टिक_मुक्त_भारत_की_ओर”
#प्लास्टिकमुक्तभारत

आज हम चारों तरफ प्लास्टिक से घिरे हुए है और इसके अत्यधिक आदि हो चुके हैं। पढ़ें लिखे हैं तो इसका पर्यावरण पर नाकारात्मक और दुष्प्रभाव से भी भली-भांति परिचित हैं। फिर भी हम इसके उपयोग को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं और प्लास्टिक प्रबंधन से हमें तो कोई मतलब ही नहीं है।
सरकार अपनी पूर्व घोषणा को पूरा करते हुए कल से यानी “१-जुलाई-२०२२ से एकल उपयोग प्लास्टिक/ सिंगल यूज प्लास्टिक #singleuseplastic (SUP) जिसे सिर्फ एक ही बार प्रयोग किया जाता है और थर्मोकोल पर चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंधित लगा रही है। SUP के उत्पादन के साथ ही आयात पर भी प्रतिबंध होगा। हालांकि इसका विरोध प्लास्टिक उत्पादकों और विक्रेताओं द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
काफी लोगों के रोजगार इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। निश्चित ही काफी लोगों की रोजीरोटी प्रभावित होगी। लेकिन सुरक्षित भविष्य और आने वाली पीढ़ी के लिए वर्तमान में कुछ ठोस निर्णय लेना बिल्कुल वाजिब है। नियम उल्लंघन करने पर सरकार की तरफ से वाणिज्यिक लाइसेंस रद्द किए जाने की बात कही जा रही है।
प्लास्टिक का दुष्प्रभाव पर्यावरण,वन, जीवजंतुओं तथा जलवायु को जिस कदर पड़ रहा है, मद्देनजर रखते हुए यह कठोर कदम उठाया जाना जरूरी है।
स्ट्रा, ईयरबड, गुब्बारे, कैंडी,आइस-क्रीम्स,जिसमें प्लास्टिक की छड़ लगी होती है,प्‍लास्टिक स्टिक्स, डैकोरेशन के लिए प्रयोग होने वाली पोली स्‍टाइरिन,
प्लास्टिक के बर्तन (चम्मच, प्लेट, चाकू, कांटे,ग्लास आदि)
सिगरेट के पैकेट रैपिंग फिल्‍म, मिठाई के डिब्‍बे, निमंत्रण पत्र, पीवीसी बैनर, पैकेजिंग फिल्म और साज सज्जा में इस्तेमाल होने वाला थर्मोकोल आदि पर प्रतिबंध है। और भी अनेक प्रतिबंध और प्रावधान लागू हो रहे हैं। साथ ही इनके विकल्पों पर भी सरकार रिसर्च कर रही है और प्लास्टिक के विकल्पों पर काम काम करना शुरू कर दिया है। वहीं गन्ने की खोही, केले के छिलके एवं मक्के की बाली, केले के पत्तल,ढाक के पत्तल और दूसरे पेड़-पौधों के पत्तों तथा मिट्टी से बने थाली, ग्लास और दोने आदि बाजारों में उपलब्ध कराया जा रहा है।
प्लास्टिक मुक्त भारत की ओर सरकार अपनी ओर से अथक प्रयास कर रही है।
सरकार के निर्देश और निर्णय का स्वागत करते हुए हम सब भी अपनी भागीदारी घर से कपड़े की थैली और ठोंगा/ठुंग्गा/ पेपर बैग के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर सुनिश्चित कर सकते हैं।

— जब जागो तभी सवेरा — अब भी देर नहीं हुई है।
तो चलिए “#एक_कदम_प्लास्टिक_मुक्त_भारत_की_ओर”

अबकी बारिश

सुनो!
सूखी तप्त मिट्टी में जब
पहली बारिश की बौछार पड़ेगी ना
सौंधी सी महक से
महक उठेगी मिट्टी •••

आँखें बंद कर
लंबी सांस खींचना
और
महसूस करना
मिट्टी के सौंधेपन को
यह तुम्हारे हिस्से का प्रेम है •••

हाँ! हो सके तो
कुछ खाब बुनना
भीगना पहली बारिश में
नया रंग भर देना उन बूंदों में
लाल, नारंगी, जामुनी और
एक पक्का रंग विश्वास का
छोड़ आना दर्द के काफिले को
ले जाना साथ
अपने हिस्से की सुकूं और
अपने हिस्से की नमी को भी
और जीवित रखना
संभावनाओं को •••

-अपर्णा विश्वनाथ

अमलतास

चुभती धूप/तपती सड़कों पर/
सरपट भागते हुए लोग है
लेकिन एक मोड़ पर
उस पीले झूमर तले/उससे टपकते चटकीले पीले रंग से/पीताम्बरा की मौजूदगी से/
सदियों से बेज़ार एक घर/कुछ खंभे/और लाल दिवारें/
आज गुलज़ार है/
अहा! पीताम्बरा
गोया,
सूरज ने/अपना पूरा पीला रंग/तुम पर ही उड़ेल दिया है/

बेसाख्त ठहर जाती हूँ…
न न ठंडी छांव के लिए नहीं/
बस कुछ सुस्त लम्हों को ढूंढने/ कुछ रुका हुआ दर्द बताने ,
लेकिन
मेरी मौजूदगी की/इसे क्या ख़बर /
औचक, टहनियों से/बेशुमार फूलों की पंखुड़ियांँ छलक/
कुछ हथेलियों पर/और कुछ कानों पर आकर/
क्यों, फासलों में भी तो जिन्दगी है/
कहते हुए ठहर से जाते हैं।

-अपर्णा विश्वनाथ

#शुभकामना_सन्देश”””””””””””””””””””””””कभी कभी छोटी सी बात हमारे मन को छू जाती है।वैसे तो मैं व्हाट्सएप युनिवर्सिटी पर अग्रेषित शुभकामनाओं वाले सन्देशों के पुनःअग्रेषण से बचती हूंँ।अग्रेषित सन्देशों का इधर से उधर करना मात्र औपचारिक और खानापूर्ति जैसा लगता है।बगैर लागलपेट कहूँ तो, फारवर्ड मेसेज को फिर से फारवर्ड करना मुझे कम ही भाता है। कल भी अधिकतर शुभचिंतक अपनी भावनाओं और अभिलाषाओं को अग्रेषित सन्देशों द्वारा व्यक्त कर रहे थे। मंगलकामनाएंँ इस पार से उस पार और उस पार से इस पार हो रहें थे। मैं अपने नियामक को तोड़ते हुए कहीं से आए अक्षय तृतीया(आंग्ल भाषा में) के सन्देश को कुछ अपनों को अग्रेषित कर देती हूँ। प्रत्युत्तर में अधिकांश वही वही अग्रेषित सन्देशों की भरमार।लेकिन एक प्रत्युत्तर कि :आपको भी अक्षय तृतीया की बधाई मैडम।”आप धन संपदा की स्वामिनी बनी रहें और उसकी हवा हम तक भी आती रहें।” पढ़ते हुए लगा सचमुच कोई दुआ (अस्पृश्य) मुझ तक पहुंच रही है।यह शुभकामना सन्देश भी कुछ शब्दों का मेला ही तो था।लेकिन…बहुत ही निश्छल मन से उकेरा हुआ।अद्वितीय। मन को कहीं स्पर्श कर गया।सोने चांदी का सुख तो भौतिक है,नश्वर है।वहीं प्रार्थना और दुआओं का सुख आत्मिक है। बहुत फर्क है दोनों में। सोचिएगा इसके बारे में।इसलिए दुआएं देते रहिए और लेते भी रहिए।यही शाश्वत है। धन्यवाद दोस्त 🌺-अपर्णा विश्वनाथ