#एक_खत_बापू_के_नाम

स्वतंत्रता के लिए निरक्षर रहकर आम रास्ते पर गिट्टी तोड़ना गुलामी में रखा अक्षर ज्ञान पाने से कहीं अच्छा है। शायद आप मेरी बात के मर्म को समझ सकेंगे।”
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#एक_खत_बापू_के_नाम

प्रिय बापू,
सादर प्रणाम,
कलम और स्याह की जगह अब तो डिजिटल प्रिंट ने ले ली है।
खत लिखने का सिलसिला भी कहीं छूट सा गया है बापू।
कहाँ से आरंभ करूं ? क्या लिखूंँ क्या न लिखूंँ ?
न न यह कशमकश नहीं है और न ही असमंजस की स्थिति है। सिर्फ मन आहत है। बापू आज के दिन जगह जगह आपको याद करते, सूत कताई करते, चरखा चलाते, अक्स पर फूल माल्यार्पण करते जोश-खरोश में अभिभाषण, वार्तालाप तथा विचार-गोष्ठी करते खूब नज़र आ रहे होंगे।
हाँ क्यों न हो ! आपका जन्मदिन जो है।
क्या कहा ? आप खुश नहीं है !
बापू यह आपके सपनों का ही भारत है। बस समयानुसार कुछ जरूरी और लाज़मी बदलाव आए हैं।
हाँ राजनैतिक उथल-पुथल, सामाजिक, आर्थिक और नैतिक मूल्यों में पतन हुए तो हैं। कर भी क्या सकते हैं।शायद इसे ही तरक्की कहते हैं।
क्या कहा — और शिक्षा ?
शिक्षा का तो क्या ही कहा जाए बापू आजतक प्रयोग हो ही रहे हैं। शिक्षा का अबाध निजीकरण और बाजारीकरण हमारे शिक्षा प्रणाली में इस तरह हावी हुआ है कि हर रोज़ कुकुरमुत्ते की तरह पनपती संस्थाओं के कंधों पर मानो देश के भविष्य की सारी जिम्मेदारी आ गई है। जिन्होंने शिक्षा को पूरी तरह व्यवसाय से जोड़ दिया। आज अच्छी और उच्च शिक्षा एक खास वर्ग तक सीमित होकर रह गई है। जबकि आपने समग्र, संपूर्ण और समान शिक्षा का सपना देखा था।
हाँ बापू आपने जो १४ वर्ष तक अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा कहा था उसका पालन हो रहा है। बस विडंबना यह है कि मुफ्त शिक्षा होते हुए भी स्कूल जाने वाली आधी आबादी निजी विद्यालयों में भारी-भरकम राशि फीस के रूप में भरकर विद्या हासिल करने हेतु मजबूर हैं।
बापू मैं जहां तक बुनियादी शिक्षा (नयी तालीम) के बारे में जान पाईं हूँ अपने देश के लिए इससे बेहतर कोई दूसरी विचारधारा या प्रणाली नहीं है। यह आज भी उतनी ही कारगर साबित होती जितनी तब। जरूरत सिर्फ इतनी थी कि समयानुसार निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण को देखते हुए पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या में थोड़े-बहुत बदलाव।
शिक्षा शिक्षा नीति २०२० बनकर तैयार तो हो गई है। लेकिन कहीं न कहीं अंतर्विरोध भी है।
बुनियादी शिक्षा को अधिक समझने और भारत जैसे देश के लिए यह क्यों जरूरी है, जानने के लिए बहुत सारी पुस्तकें पढ़ी। इसी क्रम में “सत्य के मेरे प्रयोग” भी पढ़ी।
जिसमें एक अध्याय “बच्चों की शिक्षा” जिसमें आपने अपने डरबन के दिनों के बारे बताया।
बापू मैं जान और समझ पाई कि बुनियादी शिक्षा कोई एक दिन की उपज नहीं थी। इसके पीछे आपके वर्षों के अनुभव, आपके प्रयोग, आपके प्रयास, आपके त्याग और बलिदान थें। कोई दो राय नहीं कि आप एक दूरदर्शी थे। भारत के आज और कल से भली-भांति परिचित थे।
यह बात शायद किसी के बताने से ज्यादा स्वत: आपको आपके चश्मे से कोई पढ़े तो बिना किसी बहस, अंतर्द्वंद्व और मतभेद के आपको और आपकी नीतियों को समझ सकेंगे। आपने शिक्षा में एक सकारात्मक दिशा प्रदान की।
शिक्षा, मातृभाषा और मातृभूमि के बारे में आपकी जो जद्दोजहद रही, यह डरबन की घटना में मैं साफ देख सकती हूंँ बापू।
बापू के सन् १८५७ डरबन यात्रा “बच्चों की शिक्षा” साझा करती हूँ।
अट्ठारह सौ सत्तावन की जनवरी में मैं जब डरबन में उतरा था तब मेरे साथ तीन बच्चे थे। मेरा भांजा लगभग 10 वर्ष की उम्र का मेरा बड़ा लड़का 9 वर्ष का और दूसरा लड़का 5 वर्ष का। प्रश्न था कि इन सब को कहां पढ़ाया जाए। मैं अपने बच्चों को गौरव के लिए चलाने और चलने वाले स्कूल में भेज सकता था। लेकिन वह केवल मेहरबानी और अपवाद स्वरूप होता। दूसरे सब हिंदुस्तानी बच्चे वहांँ पर नहीं पढ़ सकते थे। हिंदुस्तानी बच्चों को पढ़ाने के लिए ईसाई मिशन की स्कूल थे। लेकिन मैं उन्हें अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार ना था। वहांँ दी जाने वाली शिक्षा मुझे पसंद नहीं थी। वहांँ गुजराती माध्यम से शिक्षा मिलती ही कहांँ से। सारी शिक्षा अंग्रेजी में ही दी जाती थी। बहुत कोशिश की जाती तो अशुद्ध हिंदी में दी जा सकती थी। लेकिन इन और ऐसी अन्य खामियों को सहन करना मेरे बस में नहीं था। मैं खुद बच्चों को पढ़ाने की थोड़ी बहुत कोशिश करता था। लेकिन यह बहुत अनियमित रहा। मैं अपने रुचि के अनुकूल गुजराती शिक्षक खोज ना सका। मैं परेशान हुआ मैंने ऐसे अंग्रेजी शिक्षक के लिए विज्ञापन दिया जो बच्चों को मेरी रुचि के अनुकूल पढ़ा सके। मैंने सोचा कि इस तरह जो शिक्षक मिलेगा उसके द्वारा थोड़ी नियमित शिक्षा होगी और बाकी मैं खुद जैसे भी बन पड़ेगी दूंगा। एक अंग्रेज महिला को 7 पाउंड वेतन पर रखकर गाड़ी कुछ आगे बढ़ाई।
बच्चों के साथ में केवल गुजराती में ही बात करता था। इससे उन्हें थोड़ी बहुत गुजराती सीखने को मिल जाती थी। मैं उन्हें स्वदेश भेजने के लिए तैयार ना था। उस समय भी मेरा यह ख्याल था कि छोटे बच्चों को माता-पिता से अलग नहीं रहना चाहिए। सुव्यवस्थित घर में बच्चों को जो शिक्षा सहज मिल जाती है वहांँ छात्रावास में नहीं मिल सकती। इसलिए बच्चे ज्यादातर समय मेरे साथ ही रहे। भांजे और बड़े बेटे को मैंने कुछ महीनों के लिए देश में अलग-अलग छात्रावासों में जरूर भेजा लेकिन वहां से उन्हें तुरंत वापस बुला लिया था। बाद में मेरा बड़ा बेटा व्यस्त होने पर अपनी इच्छा से अहमदाबाद के हाई स्कूल में पढ़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका छोड़कर देश चला गया था। अपने भांजे को जो शिक्षा मैं दे सका उससे उसे संतोष था। ऐसा मैं मान सकता हूं। भरी जवानी में कुछ ही दिनों की बीमारी के बाद उसका देहांत हो गया। मेरे दूसरे तीन बेटे कभी किसी स्कूल में गए ही नहीं। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह के सिलसिले में मैंने जो विद्यालय खोला था उसमें उन्होंने थोड़ी बहुत नियमित पढ़ाई की थी। मेरे यह प्रयोग अधूरे थे बच्चों को मैं खुद जितना समय देना चाहता था उतना दे नहीं सका। इस कारण से और दूसरे कारणों से मैं अपनी इच्छा के अनुसार उन्हें अक्षर ज्ञान नहीं दे पाया। इसके लिए मेरे सभी बच्चों को मुझसे थोड़ी बहुत शिकायत भी रही है। क्योंकि जब भी वह किसी भी एक यूनिट के बीच में आते तब उन्हें यह कमी बहुत खलती थी कि वे खुद किसी स्कूल में नहीं पढ़ पाए हैं। इस पर भी मेरी अपनी राय यही है कि अनुभव ज्ञान उन्हें मिला है। माता-पिता के जो संपर्क में पा सके हैं। स्वतंत्रता का जो मूल पाठ में सीखने को मिला है वह सब उन्हें न मिलता अगर मैं उन्हें किसी भी तरह के स्कूल में भेजने की बात मान ली होती। उनके बारे में आज मैं जितना बेफिक्रे हूं तब ना होता और जो सादगी तथा सेवा भाव उन्होंने सीखे हैं वह मुझसे अलग रहकर इंग्लैंड में या दक्षिण अफ्रीका में शिक्षा पा करके वह सीख ना पाते। बल्कि उनका बनावटी रहन-सहन देश के प्रति मेरे काम में मेरे लिए शायद रुकावट की डालता था। ना कि मैं उन्हें जितना चाहता था उतना अक्षर ज्ञान नहीं दे सका तो भी जब मैं अपने पिछले बरसों पर निगाह डालता हूं तो मेरे मन में यह ख्याल नहीं आता है कि जहां तक हो सका मैंने उनके प्रति अपने धर्म का पालन नहीं किया और ना ही मुझे उसके लिए पछता भी होता है। इसके विपरीत अपने बड़े बेटे के बारे में मैं जो दुखद परिणाम देखता हूं तो मुझे हमेशा यही लगा कि वह मेरे अधिकार से अतीत की गूंज है।
फिर भी एक बात तो है कि मेरे प्रयोग का अंतिम परिणाम तो भविष्य ही बता सकता है। यहांँ इस विषय की चर्चा करने का प्रयोजन तो यह है कि मनुष्य जाति के विकास का अध्ययन करने वाले लोग ग्रहण शिक्षा और स्कूली शिक्षा के भेद और माता पिता द्वारा अपने जीवन में किए हुए बदलाव का उनके बच्चों पर जो असर पड़ता है उसका कुछ अंदाजा लगा सकें। इसके अलावा इस अध्याय का एक उद्देश्य यह भी है कि सत्य का पुजारी इस प्रयोग से यह देख सके कि सत्य की आराधना उसे कहां तक ले जाती है और स्वतंत्रता देवी का उपासक यह देख सके कि देवी कैसा बलिदान चाहती हैं। बच्चों को अपने साथ रखते हुए अगर मैंने स्वाभिमान का त्याग किया होता तो दूसरे भारतीय बच्चें जो शिक्षा ना पा सकें उसकी अपने बच्चों के लिए इच्छा ना रखने का विचार ना पैदा होता तो मैं अपने बच्चों को अक्षर ज्ञान जरूर दे सकता था। लेकिन उस दशा में स्वतंत्रता और स्वाभिमान का जो मूल पाठ का सीख वह ना सीख पाते और जहां स्वतंत्रता का अक्षर ज्ञान के बीच ही चयन करना हो वहांँ कौन कहेगा कि स्वतंत्रता अक्षर ज्ञान से हजार गुनी अधिक अच्छी नहीं है। सन 1920 में मैंने जिन नौजवानों को स्वतंत्र छीनने वाले स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ने का आवाहन किया था और मैंने जिन से कहा था कि स्वतंत्रता के लिए निरक्षर रहकर आम रास्ते पर गिट्टी तोड़ना गुलामी में रखा अक्षर ज्ञान पाने से कहीं अच्छा है। शायद आप मेरी बात के मर्म को समझ सकेंगे।
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आप यूँ ही बापू और राष्ट्रपिता नहीं है।
आपको शत-शत नमन है बापू।

-अपर्णा विश्वनाथ
२-१०-२०२१

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