भारत दर्शन: यादों के गलियारों से एक दक्षिण यात्रा : तस्वीर साभार : स्वरूप मरूवाडा


भारत दर्शन : यादों के गलियारों से
एक दक्षिण यात्रा
तस्वीर साभार : स्वरूप मरूवाडा

आज यादों के गलियारों से कुछ लम्हें मुस्कुरा रहे थे। जैसे ही हमने पन्ने पलटे वो लम्हें पन्नों से झाँकते हुए बाहर निकल आते हैं और हम पहुंच जाते हैं भारत दर्शन की एक कड़ी में जो भारत के दक्षिण में स्थित है।
दक्षिण भाग का नाम लेते ही वहाँ के प्राचीन ऐतिहासिक प्राचीन देवालयों की छवि और उनसे जुड़े कहानियाँ मानस पटल पर हिलौरें मारने लगते हैं। अब इसे आप तीर्थ यात्रा या भारत दर्शन का हिस्सा कुछ भी कह सकते हैं। हर भारतीयों की यह इच्छा और सपना दोनों ही होती है कि वह जीवन में कम-से-कम एक बार तो दक्षिण भाग की यात्रा जरूर करें चाहे वह किसी भी क्षेत्र के रहवासी हों। कुछ लोग पुरातत्व और अतीत की जानकारी को खोजने आते हैं। मकसद कुछ भी हो मगर यहाँ की हरियाली, हिन्दमहासागर तट पर हिलोरें, नारियल के पेड़ों की कतारें सबके मन को सुकून से जरूर भर देती हैं। दक्षिण की यात्रा सचमुच आस्था, पौराणिक कथाओं और रोमांच से भरपूर है। तो चलतें हैं दक्षिण भारत की प्राचीन ऐतिहासिक देवालयों में से एक मदुरै की मिनाक्षी अम्मा मंदिर।  ट्रेन, हवाई जहाज या रोड़वेज किसी भी प्रकार से साधन से आप वहाँ पहुंच सकते हैं। ठहरने की सुविधा भी बजट के हिसाब से उपलब्ध है। अगर मन्दिर के आसपास रहने का इंतजाम हो तो ज्यादा अच्छा है। क्योंकि सुबह और शाम दो बार पैदल जा कर आरती दर्शन कर सकते हैैं और आस-पास के बाजारों में घूम सकते हैं।
हालांकि छुट्टियों का समय और भीड़ होने के बावजूद हमें मन्दिर के पास ही एक होटल में रूम्स मिल गए थे ।
खाना साउथ इंडियन थाली में सांभर भात सब्जी पापड़ अचार और दही। भूख लगी थी सो सभी ने बड़े चाव से खा लिए।
अब मीनाक्षी अम्मा के दर्शन करने की ललक थी सभी में सो हम सभी अपने विश्रामालय(होटल) से निकल पगडंडियों से होते वहाँ के स्थानीय बाजारों को देखते हुए पैदल यात्रा करते देवालय तक पहुंचें। कहा जाता है कि मदुरै का पुराना शहर 2500 वर्ष से अधिक पुराना है और इसका निर्माण पांडियन राजा कुलशेखर ने 6वीं शताब्‍दी में कराया था। शाम होने को थी जल्दी जल्दी हमलोग मन्दिर दक्षिण द्वार(सबसे ऊंचा नौ मंजिला)से प्रवेश करते हैं।

मन्दिर में चार द्वार( गोपुरम) हैं जो एक दूसरी दिशाओं को जोड़ते हुए हैं। क्योंकि मन्दिर ४५ एकड़ है तो एक बार में पूरा चक्कर लगाना काफी मुश्किल है।
अंदर आते ही आँख बिना झपकाए हाथों से पत्थरों से बने दिवारों और शिल्प कलाकृतियों को छूते उन्हें महसूस करते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे। भीड़ थी अम्मा की दर्शन के लिए लाइन में सभी आतुर गर्भ गृह से थोड़ी दूरी पर घुमावदार रास्ते से गुजर रहें थे। आखिर हम सभी ने दर्शन किए। सुंदर रेशमी वस्त्रों में पुष्प से सुसज्जित अम्मा की आँखें अलग से चमक रही थीं। मीन यानी मछली सी आँखों वाली मीनाक्षी माता पार्वती की ही स्वरूपा हैं!

काले पत्थरों से बना गर्भ गृह, पवित्रता में नहाया वातावरण और वहाँ आए भक्तगण मानो भावविभोर हो रहें थे।
पहली बार में रास्ते का ज्ञान नहीं हो पाने की वजह से हम कहीं के कहीं पहुंच जाते हैं।
मन्दिर के पत्थरों और उन पर खुदे मुर्तियों को देखना एक खास अनुभव रहा। चलते चलते हम आयिराम काल मण्डप या सहस्र स्तंभ मण्डप या हजा़खम्भों वाला मण्डप,  1000 भव्य तराशे हुए स्तम्भ हैं जो कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुरक्षण में है पहुंच जाते हैं।
वाह सुंदर दृश्य शायद यह पहली बार था जब हमने इतने सुन्दर हजारों साल पुराने हजारों खम्भे देखने के हम चश्मदीद गवाह रहे। आनंद विस्मय सब एक साथ दस्तक दे रहें थे।

ऐसी धारणा है, कि इसका निर्माण आर्य नाथ मुदलियार ने कराया था। प्रत्येक स्तंभ पर शिल्पकारी की हुई है, जो द्रविड़ शिल्पकारी का बेहतरीन नमूना है। इस मण्डप में मन्दिर का कला संग्रहालय भी स्थित है। इसमें मूर्तियाँ, चित्र, छायाचित्र एवं वित्रकारी, इत्यादि के द्वारा इसका १२०० वर्ष का इतिहास देख सकते हैं।इस मण्डप में मन्दिर का कला संग्रहालय भी स्थित है। वाकई उनमें रखे गए परे  मन्दिर का नमूना देखने वा महसूस करने योग्य है।

इस मण्डप के बाहर ही पश्चिम की ओर संगीतमय स्तंभ स्थित हैं। इनमें प्रत्येक स्तंभ थाप देने पर भिन्न स्वर निकालता है।

पोत्रमरै कूलम स्वर्ण कमल वाला सरोवर” और कहते हैं कि इसमें होने वाले कमलों का वर्ण भी सुवर्ण ही है। यह एक लंबा चौड़ा सरोवर मन्दिर के भीतर भक्तों हेतु अति पवित्र स्थल है। भक्तगण मन्दिर में प्रवेश से पूर्व इसकी परिक्रमा करते हैं। ऐसी धारणा है कि लेखक यहां अपने साहित्य कार्य रखते हैं, और परखते हैं। तमिल धारणा अनुसार, निम्न कोटि के कार्य इसमें डूब जाते हैं, एवं उच्च श्रेणी का साहित्य इसमें तैरता है, डूबता नहीं।
है ना अमेजिंग।

नटराज के रूप में शिव की मनमोहक मूर्ति आकर्षक का केन्द्र हैं।

आँखों को सुकून, चित्त को शान्ति और शुद्धि प्रदान करने वाली मिनाक्षी अम्मा के दर्शन कर हम सभी धन्य महसूस कर रहे थे।
दूसरे दिन तड़के सुबह हम सभी नहा-धोकर स्वच्छ वस्त्रों में अम्मा की आरती देखने और फिर एक बार दर्शन के लिए हम सभी निकल पड़ते हैं। मन भर दर्शन कर उनकी आँखों की चमक को देखते हुए उन्हें प्रणाम कर वापस एक चक्कर लगाते हुए उत्तर द्वार से वापस ढेरों यादों को समेटे दुबारा फिर आने की संभावना लिए अम्मा को टाटा बाय बाय कहते अपने विश्रामालय में वापस लौट आते हैं।

सभी तस्वीरें मेरे भांजे स्वरुप मरूवाडा द्वारा खींची गई है।

धन्यवाद बोलना कम पड़ेगा। क्योंकि यह केवल तस्वीर ही नहीं बल्कि इनमें कुछ बोलते और सुनते हुए लम्हें सुरक्षित है। जो किसी भौतिक सुख और धन से कहीं अधिक है।

क्रमशः …

-अपर्णा विश्वनाथ

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