अमलतास

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दरख़्तों को हमने हंसते हुए देखा है मौसम चाहे कितनी मनमानियां कर लें। हमेशा खिड़कियों से झांकता मेरा मन उन दरख़्तों को देखता है जो कुछ मांगता नहीं वरन् कुछ देता ही है। अवाक् कर देता है मुझे। कितने नि:स्वार्थ हो तुम!
आज भी वह अमलतास अनवरत अविचल नि:शब्द नि:श्छल बिना किसी भेद भाव के लोगों की तिमारदारी कर रहा हो जैसे।
ना जाने कितने रेहड़ी वालों सब्जी वालों को आश्रय देता। उसकी ठंडी छाया जेठ की तपती धूप में भी मानो हिम तुषार सा एहसास दिलाता।
अमलतास से ना जाने एक लगाव सा है मुझे। कितनी खुबियां समेटे हुए अपने में । एक विमर्श अंतर्मन में उमड़ पड़ता है अमलतास के लिए :

एक दरख़्त देहली के पास
अमलतास
सुख दुख में आस पास
सदाबहार बारहों मास
प्रवृत्ति जिसकी
मौसमी गुलाब नहीं
वरन्
हमेशा एक सा व्यवहार
पथिको को अवलंब देता
ऐसे मज़बूत दृढ बाहुपाश
कांटों से भरी टहनी नहीं
पर्णों से भरा-पूरा
हरा भरा
शाखाएं अपार
हृदय तल को पंख देता
उसमें हिंडोले दो चार
लगे तमस अंधेरे में
जैसे सारंग हो नक्षत्र लिए
शीर्ष तुंग श्रृंग हो जिसके
पीले प्रसूनों की झुरमुटों से
श्रृंगार हो जैसे किए
उषा की सुनहरी किरण
ओढ़ कर
बसंत का बयार लिए
जेठ की तपती दुपहरी में
जैसे
शीतल हिम तुषार
हरी भरी सावन में
पुल्कित करता मन
हर्षित होता वातावरण
मदांध सुरभि जब इसके
बिखरे चहुंओर
और अनेक गुणों से इसके
चित्त रहे आमोद प्रमोद
सदा रहो आस पास
अनवरत अविचल
अमलतास

-अपर्णा🍁

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