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मिस्ड यू (एक संस्मरण)


कुछ मुलाकातें यादों का घरौंदा बन ज़हन में ठहर जाती हैं।
लंबे अंतराल में यादों में कुहास सा छा जाता है। फुर्सत के लम्हों में फिर कुहासा अपने आप छंट जाता है। सुबह का समय काफी हड़बड़ी और व्यास्तता से भरा हुआ करता है। जिंदगी की आपाधापी को खामियां ही कह लिजिए कि हमें सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती। बस स्टैंड पर समय से कुछ पहले पहोंच कर थोड़ी गहरी सांस फिर इधर उधर नज़रें फिराना सबकुछ ठीक ठाक तो है ना ? मेरे आदत में शुमार थी।घर से बस स्टैंड तक रास्ते में कुछ दरख़्त, सुर्ख लाल सफेद पीले मौसमी फूलों की मदमस्त खुशबू , कुछ जंगली पौधों की कच्ची महक, सूखे पत्तों की सरसराहट , कुछ जानवर, स्टैंड पर लगे हुए बिल होर्डिंग्स सभी को हाय हेलो नज़रों से कह दिया करती थी। लगता सभी मेरी राह देखा करते हैं। शायद देखते भी हो! सुबह-सुबह सभी बस स्टैंड पर अपनी अपनी मंजिल तय करने को बेसब्री से साधनों का इंतजार करते । यह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई थी। मेरे साथ शायद बहुतों की भी। एक दुसरे से पहचान सिर्फ एक हल्की-सी मुस्कान तक ही सीमित थी। इससे ज्यादा सरोकार किसी से किसी को नहीं। हर कोई भागा भागा सा निगाहें अपनी अपनी साधनों और घड़ी की सूइयों की निगरानी में व्यस्त। स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों के पेरेंट्स भी उस दौड़-भाग का हिस्सा होते। समय ने सभी को कठपुतली की तरह बांध दिया हो जैसे। मेरे और उसके बस की टाइमिंग्स आगे-पीछे थी। मेरी पहले आती और उसकी बाद में। बस एक हल्की-सी मुस्कान से एक-दूसरे को गुड मॉर्निंग बोल लेते थे। क्योंकि इससे ज्यादा समय किसी के पास नहीं था।हर रोज एक क्षणिक मुलाकात की आदत सी हो गई थी उसके साथ। कोशिश करती की बस चढ़ कर उसे टाटा करुं वो भी कोशिश करता। कुछ लंबे अरसे तक यही सिलसिला जारी रहा लेकिन एक दिन सिलसिला टूट गया। मेरे बस की टाइमिंग बदल गई। स्टैंड पर उसकी कमी हुई बाकी सब अपनी जगह पर थे।
कभी कभी हमें अपने जीवन में बहोत से चीजों की आदत सी हो जाती है। जिसके बिना दिन कुछ अधूरा सा लगता है और फिर उसके ना होने या ना मिलने पर हम सोचने लगते हैं।
कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते क्योंकि न तो वो खून के रिश्ते होते हैं ना तो वो रिश्तेदार होते है। वो आंखों से जन्मे और दिल से बंधे होते हैं। इसका एहसास मुझे तब हुआ जब एक दिन अचानक मेरी और उसकी बस की टाइमिंग एक दिन के लिए फिर से एक हो गई । मैं हमेशा की तरह स्टेंड पर गहरी सांस ले आसपास का आदतन जायज़ ले ही रही थी कि अचानक उस पर नज़र पड़ी। नीली आंखें, भूरे बाल, पूरी यूनीफार्म में हमेशा की तरह प्यारा सा। पहली बार उस दिन लगा बस थोड़ी लेट हो जाए तो अच्छा है। उसने भी मुझे देख लिया था। अचानक उसने अपने बैग से कलम कागज निकाल कुछ झटपट लिखने लगा। शायद फिर कभी मुलाकात हो न हो शायद उसे भी कुछ ऐसा ही ख्याल आया हो। दौड़ते हुए पहली बार मेरे करीब आकर कागज़ का टुकड़ा मुझे थमा दिया हाथों से बाय का इशारा करते हुए अपनी बस में चढ़ गया।
कागज़ मुट्ठी में बंद कर मैं भी अपनी बस चढ़ गई।
सीट पर बैठ सांस लेते हुए कागज़ को खोली।
पढ़ कर अंदर जो अनुभूति हुई उसका शब्दों में बयान करना मुश्किल है। बड़े बड़े आड़े तिरछे अक्षरों में लिखा था….
Missed you……
Avi
Class – lll
आज पुरानी डायरी खोली तो वो कागज़ का टुकड़ा दबा मिला।
एक हल्की-सी मुस्कान देने के बदले में जो उपहार मुझे मिला वो अवर्णनीय है। अनायास ही एक हल्की-सी मुस्कान के साथ मैं आज भी उसे देख पा रही थी निरूत्तर नि:शब्द ……..

_अपर्णा विश्वनाथ