पतन (एक गौरवशाली अंत )
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जब,
कुचल रहा था कोई 
प्रकृति की कोमल
संवेदनाओं को
अपनी आकांक्षाओं-वांछनाओं से 
ठीक उसी समय
हो रहा था दोहन और पतन भी 
किसी की भावनाओं का
सुमन से सुकोमल स्वप्नों का । 

तुम क्या जानो
कि हवा की तरह सनसनाती
बर्फ की तरह ठंडी
नेपथ्य में कहीं 
नीलगिरि की नीली पहाड़ियों के पीछे
कुछ आँसू
मुसलसल ढलक रहे थे चुपचाप ।

कुछ अनसुनी वेदनाएँ
निःशब्द कराह रही थीं
कभी सुनना …
उन ख़ामोशियों में दफ़न
उस ध्वनि को भी
जिन्हें अनसुना करते रहे हो तुम ।

मेरी चुप्पी
मेरी चीत्कार   
जो सहमा हुआ है
चाहता है
“बदला”नहीं, कुछ बदलाव
सहनशीलता का यह हुनर
प्रकृति से मिला है मुझे ।  

देखना,
कुछ सदियों बाद
पाषाण में तब्दील हो जाएँगे आँसू
किसी जीवाश्म की तरह
युगों बाद,
जब समाप्त हो जायेगा
असंवेदनाओं का पाषाण युग ।

नीली पहाड़ी के पीछे
जमीन को छू पाएगा नीला चाँद
उस दिन
उन पाषाणों में सूखी पड़ी संवेदनाएँ
हो जाएँगी
फिर से गीली
और तब
उग आएँगे वहाँ
ख़ूबसूरत ब्रह्म कमल ।
  
पाषाणी आँखों में
भर जाएगी नमी
फूटेगी फिर
बनकर जलस्रोत
बहेगी पृथ्वी पर जीवन की नदी
जिसकी नयी धारा
बदल देगी
सभ्यता की दिशा ।

प्रकृति, नदी, सभ्यता
सभी रूप हैं स्त्री के
होती है जो प्रेमस्वरूपा
पूछती है तुमसे
देखी है कभी
आँखों की नमी ?

तुम
आना कभी
एक शाम
झाँकना मेरी दहलीज पर, 
छोटे छोटे पोर्टुलका के फूल
अब भी
उग आते हैं सूरज के साथ ।

मेरी तूलिकाओं ने
आज भी वही रंग चुनें हैं…
केसरिया,
देखो, वो जो पानी में झुर्रियाँ पड़ी हैं ना
लाखों प्रेम पत्र हैं
जो युगों से सँभाल रखें हैं मैंने ।

तुम पढ़ना
और सोचना अलक्षेन्द्र!
प्रकृति के उस प्रेम को
जिसे तुमने कुचला था कभी
पाओगे उस दिन अपने आप को
खड़ा हुआ कटघरे में ।

तुम देखना
और लिखना अलक्षेन्द्र ! 
कि प्रकृति के पतन में भी
होता है 
जीवन का एक गौरवशाली अंत ।

-अपर्णा विश्वनाथ 