नवम्बर

नवम्बर
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हर शाम की तरह आज भी शाम को विदाई देने हल्की फुल्की ठंडक लिए निशा स्याह चादर ओढ़े खड़ी है। उस समय में मानो पलाश भी इंतजार करते नील गगन से झांक रहा है।
संध्या और तुलसी को दिया दिखाते मैं हवा में हल्के-हल्के बदलाव को महसूस कर पा रही हूं।
अपने बदलते मिजा़ज का दस्तक प्रकृति दे देती है बस देखने के लिए वो निगाहें और महसूस करने के लिए संवेदनाएं हों।
हर दो माह में ऋतु बदलता है।
मां ने बचपन में ही यह बात बताई थी कि यह प्रकृति धर्म है कोई नई बात नहीं। प्रकृति किसी न किसी रूप में इसकी अनुभूति हमें करा ही देती है ।
मुझे मेरे गले और सांस में हो रही सुगबुगाहट से एहसास हो जाता कि ऋतु बदल गया।
पत्तों का पीला नारंगी रंग, बसंत का ,
वो सूखे पत्तों के सरसराहट, खडखडाहट पतझड़ ग्रीष्म का,
दरख़्तों के हल्के गाड़े हरे रंग मानो सदाबहार प्रकृति अपने पूरी जवानी में हो, वर्षा ऋतु के मिज़ाज को बयां कर रही होती है।
वैसे ही अनेकानेक बैनीअहपीनाला रंगों वाले फूल फिज़ाओं में अपनी खुशबुओं से ऋतुओं और मौसमों का संदेश वाहक के रूप में काम कर जाती हैं।
जादू सा नहीं लगता ?
करिश्मा ही तो है।
ऐसा लगता है एक छड़ी घुमाई और पूरा का पूरा नज़ारा ही बदल गया हो ।
कहीं ना कहीं इन ऋतुओं का असर हमारे मनोदशा पर भी पड़ता है।
अक्टूबर का बीतना और नवंबर का आना नियती है और सुबह आंगन में छोटे बड़े पत्तों का जंजाल सा बिछ जाना , क्या यह संकेत पतझड़ मात्र का ही है ? नहीं !!
मेहसूस कर पाती हूं मैं यह संकेत कहीं कुछ टूटने बिखरने बिछड़ने का भी है ।
वीरान और खाली पड़ी टहनियों को देखते हूं उनके आंखों में झांकती हूं और पाती हूं उनमें ग़म छुपाने का ग़ज़ब हुनर है।
मैंने भी यह हुनर सीखा है इन्हीं को देखते।
टहनियों से टूटे हुए पत्ते बिखर जाते हैं टहनियां खाली रह जाती हैं। जब कोई पत्ता शाख से टूट रहा होता है, उसी एक वक्त में मानो किसी का प्रेम भी टूटते बिखर रहा होता है।
ऊपर से निहारता उल्कापिंड साक्षी है उन प्रेमी जोड़ों के बिछड़ने का। उनके प्रेम को टूटते देख उल्कापिंड भी मानो रो पड़ता है और अचानक उल्कापिंड अपने आकाश से बिछड़ पृथ्वी पर गिर टकरा कर बिखर जाता है ।
ना ही टूटे हुए पत्ते शाख से जुड़ेंगे, ना ही उल्कापिंड फिर से अपना घर जा पाएगा।
मैं इन सबको देखते हुए ठिठक ठहर सी जाती हूं।
हवाएं भी सर्द हो चली है। हवाओं में गर्माहट नहीं है।
ठंड की रात है बहुत जल्दी गहरी होने लगती है और खामोश भी।एकांत भी छिन जाता है जब कोई टूटने बिखरने बिछड़ने की बात स्मृति पटल पर मोटी परतों की तरह जमने लगती है और एकांत पर कब्जा कर लेती है।
पत्तें , प्रेमी और उल्कापिंड सभी ठगे से बिखरे से मेहसूस कर रहें हैं और इन सबको निहारते हुए मैं भी।
दुःखी मन से फिर सबको समझाती हूं। उसका ग़म क्या करना जो हमें छोड़ जा चुके है, जो बन्धन तोड़ चुके हैं।अब उन्हें भुलाने का मौसम है। यह पत्तों के टहनियों से जुदा होने का मौसम है।
बेवफ़ा जो हुए उन्हें भुलाने का मौसम है। टहनियां मेरी ओर देख कहती हैं, हां ! अब जश्न मनाने का मौसम है फिर से नई कोंपले फूटेंगे शाख पर। फिर शाखा हरी भरी फूल पत्तियों से लदी सुंदर हो जाएगी। जब तक पृथ्वी है यह नवंबर आता जाता रहेगा। यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा कभी खत्म नहीं होगा।
हां जो बीत गया उसके मिटने का मौसम है। पतझड़ जश्न मनाने का मौसम है और कुछ बहुत नर्म, सुंदर, महीन बिखरे स्मृतियों को समेटने का मौसम है। स्मृतियां पिघल शब्दों में ढ़ल जाएगी और शब्द कविता बन विस्तारित हो जाएगी।

-अपर्णा विश्वनाथ 🍁