लिफाफा

लिफाफा
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अन्विता अमृतांजन लगाकर सोने की कोशिश करती है। लेकिन विफल होती है और ना चाहते हुए भी अतीत के गलियारे में कोई चौबीस या पच्चीस साल पीछे पक्का कुछ याद नहीं, सुदीप और खुद को पाती है। वह दौर आज के दौर से बिल्कुल अलग हुआ करता था क्योंकि उन दिनों मोबाईल और इंटरनेट ने इंसानों के मस्तिष्क को कब्जा नहीं किया था। हाँ कब्जा़ था तो सिर्फ समाज की बन्दिशों और पारिवारिक दबावों का। जो लड़के और लड़कियों दोनों ही पर इस कदर हावी था कि कम उम्र में खुद को जिम्मेदार और परिपक्व मान लेने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं उनके पास। खैर,
ना मोबाइल,ना लैपटॉप, ना इंटरनेट का जाल। बावजूद इसके कितना ही खूबसूरत था हर रिश्ता। क्योंकि हर रिश्ता बहुत नाज़ुक दिल के तार और भावनाओं से जुड़ा हुआ करता था।
आराम कुर्सी पर पड़ी आराम करते हुए अन्विता के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान बिखर जाती है। अनायास एक पुरानी डायरी खोलते हुए समय में पके और पीले पड़े हुए कुछ पन्नों को छूते भावुक हो उठती है।
हाँ! कितना खुबसूरत। शायद पूरी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत पड़ाव। जब उम्र अधकचच्चे अधपक्के दौर से गुज़र रहा था।
कॉलेज, ट्यूशन, सिलाई कढ़ाई, और घर यही दिनचर्या उन दिनों अधिकतर लड़कियों की तरह मेरी भी थी।
समय अपने वर्तुल में घूम रहा था और मौसम भी। घर से ट्यूशन जाने वाले रास्ते में पड़ने वाला अशोक,गुलमोहर, पलाश, कदंब,कनैल, पारिजात सभी अपने समय से खुशबू बिखेर रहे थे।
लाल और सफेद उडहल नक्षत्रों के समान पौधे पर ऐसे टिमटिमाते रहते थे कि हर किसी की नज़र उन फूलों पर एकबारगी तो अटक ही जाती थी।
आम के पेड़ पर आम्र मंजरी भी समय पर बौराई। नीम पर निम्बोरे भी समय से लद गए थे।

रास्ते में पड़ता बेल साल भर में अपना रुप बदलता कभी पतझड़ तो कभी वसंत और ग्रीष्म आने पर बेल पकता रहता।

शीत, बसंत और फिर ग्रीष्म बीता।

ऋतु अपने धर्म से चलता रहा और मैं भी सालों उस रास्ते पर सर झुकाए आती जाती रही।
इन सबके बीच अगर कुछ नहीं बदला तो वह था एक संयोग।
मेरे काॅलेज या ट्यूशन का समय और ठीक उसी समय उसका आगे-पीछे, दायें-बायें कहीं ना कहीं से दिख जाना। वह पास से गुज़र जाता लेकिन कहता कभी कुछ नहीं। एक हल्की सी मुस्कान सिर्फ। कुछ तो अजीब बात है। मैं खुद को संभालती कि कहीं मुझे देखकर मज़ाक तो नहीं उड़ा रहा।

अचानक एक दिन मुझे आभास होता है। अरे यह कैसा संयोग कि ठीक उसी समय वह रास्ते पर नजर आता है। नहीं नहीं यह संयोग वयोग नहीं हो सकता। मन ही मन मैं बड़बड़ाती हूँ।
यह कोई संयोग नहीं हो सकता। जाने दो मुझे क्या। ऐसे भी उस टेढ़े इंसान से मेरा कोई वास्ता नहीं।

साथ में मेरी एक सहेली भी आती जाती थी। वह भी एक दिन कह पड़ती है। उहं… मोहल्ले के गुंडे हैं। चलो अपने रास्ते। जितना डरोगी उतना ही डराएगा।
समय बीतता गया। अब मैं भी उसका इंतजार कहीं ना कहीं करने लगी थी। यह निश्चित करने के लिए कि वह मुझे ही फाॅलो करता है। मैं गर्दन झुकाए रहती लेकिन आँखें इधर उधर कर उसे ढूंढती।
एक दिन मैं अकेले ट्यूशन जा रही थी। मेरी सहेली नहीं आई थी। मौका पाकर वह मेरे थोड़े से करीब आकर साथ साथ तेज कदमताल करते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहता है : अच्छी दिख रही हो आज। हेयर स्टाइल काफी अच्छा लग रहा है तुम पर।
मेरी नज़र जमीन पर गढ़ जाती है। साथ ही अंदर से कोमल एहसास का एक बीज दब रहा होता है। अरे भई बीस-बाईह उम्र के इस पड़ाव पर किसे अपनी हुस्न की तारीफ सुनना अच्छा नहीं लगा होगा। एक तो लड़की फिर ऊपर से उम्र का तकाजा था। इसमें कोई दो मत नहीं कि दोनों ही भावनाओं की चिंगारी को हवा देने के लिए काफी थे।
मन ही मन मैं सोचती हूँ। नहीं नहीं इससे तो मैं बहुत डरती हूँ। प्यार व्यार यह सब भ्रम पालना बिल्कुल सही नहीं है। विश्वास दुनिया में सबसे दुर्लभ है। कोई किसी पर यूं ही कैसे कर ले।

और फिर यह होता कि जब जब मन प्रकाश की गति से भागता है तब तब मन के दरवाजे पर सामाजिक दबाव और जिम्मेदारियांँ अपनी सांकल लिए दरवाजे पर खड़ी दिखाई पड़ती है।
तभी अचानक से एक अनजाना सा डर मेरे खुलते पंख और सोच पर अंकुश लगा देता है।
फिर क्या सारा वेग और उष्णता वहीं के वहीं खत्म। मैंने उसे देखने की जुर्रत करना छोड़ दिया। लेकिन वह अपने समय से। बिल्कुल अनुशासित। कम जिद्दी ना था। जाते नहीं तो आते कहीं न कहीं अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देता था।

यह सिलसिला कितने दिनों या सालों तक चला यह बहुत सोचने पर भी स्मृति पटल पर नहीं आ रहा है। लेकिन उसे लेकर मेरा अकडू रवैया और डर जस का तस क़ायम रहा।

फिर एक दिन जो हुआ वह मेरे जीवन काल का अमिट हिस्सा बन कर रह गया।
रोजमर्रा की तरह वह दिन भी एक आम दिन था। ट्यूशन से मैं वापस लौट रही थी कि सुदीप बाबू रास्ते पर दिखाई दिए। पास आकर बोले घर आओ।
माँ तुम्हें बुलाई है। हम सभी एक ही मोहल्ले के थे। सुदीप भी एक भरा पूरा परिवार वाला था। मैं बोली अभी नहीं बाद में आऊँगी।
एक बार आ जाओगी तो कम हो जाओगी क्या ! कसम से माँ ने बुलाया है तुम्हें। कुछ काम होगा तुमसे।
क्या काम ?
सुदीप: अरे यहीं सब फरिया लोगी क्या। मुझे क्या मालूम है। चलो न देखो घर आ गया है। चलो। चलो ना।
उफ्फ् यह क्या उलटबांसी है। सोचते हुए आखिर मैं सुदीप के आग्रह पर उसके पीछे हो लेती हूँ। आखिर पड़ोसी है। कोई दुश्मन थोड़े है।
सुदीप अपने लंबे लंबे डेग फेंकते हुए आगे आगे। मैं पीछे पीछे। घर के बाहर छोटी सी लोहे की गेट थी। सुदीप गेट खोलता है। हल्की मुस्कान के साथ मुझे भी अंदर आने का न्योता देता है। मैं भी पीछे पीछे गेट के अंदर। फिर घर का मुख्य द्वार खोलता है। पर्दा थोड़ा से घसकाकर अंदर से झांकते हुए घर के अंदर आने को कहता है। मैं गर्दन झुकाए, किताब काॅपी की बैग टांगें घर के अंदर प्रवेश करती हूँ।
सुदीप : खड़कपुर से आई हो।
खड़ी रहोगी क्या? बैठो।
उहं : मैं सोफे पर बिना भार दिए एक तरफ झुककर बैठ जाती हूँ।
सुदीप : अरे ऐसा लगता है कि भागिये जाओगी। ठीक से बैठ जाओ ना।
मैं धीरे से नजर चारों ओर फेरती हूँ।
सुदीप बगल सोफे पर पास बैठा था। रूम ख़ूब सुन्दर क़रीने से सजा हुआ था। बीच में टी-टेबल। अखबार, कुछ कागज़ात और कलम। सभी क़रीने से रखे हुए थे। दरवाजे, खिड़कियों पर पर्दे खींचे हुए थे। दीवार पर कुछ चित्र टंगे हुए थे। बिल्कुल शान्त माहौल।

कुछ कौतूहुलता, कुछ झिझक पनप रही थी मुझमें। कुछ समझ नहीं आया तो मैं अखबार को देखते हुए इंतजार करने लगी कि आंटी बाहर आए। जिन्हें मैं मिलने आई हूँ।
सुदीप मुझे देख हल्की मुस्कान देता। यह जो तीर वाली बिन्दी लगाती हो ना बहुत अच्छी लगती है तुम पर।
जवाब में मैं बोलती हूँ, आंटी को बुला दो ना प्लीज़।
सुदीप: क्यों मैं तुम्हें खा जाऊंँगा क्या। इतना डरती क्यों है रे तुम मेरे से?
अरे यार आ जाएगी माँ भी।
मैं भी तो हूँ। इसी घर का। मुझसे बात नहीं कर सकती क्या तुम? डरो मत ना हमसे।
मुझे कुछ महसूस हो रहा था। मेरी आँखें बड़ी और तीखी होने लगी। सुदीप भाँप गया कि मैं नाराज़ हो रही हूँ।
सुनो न।
गुस्सा तो नहीं करोगी ना? एक बात कहूंँ ?
मेरा पारा गुस्से से चढ़ रहा था। मैंने दबे आवाज में कहा – अब जो कहना है जल्दी कहो।
सुदीप : गुस्सा नहीं होओगी। वादा करो।
अब बोलो भी । दबी आवाज में जोर देकर मैंने कहा।
सुदीप : माँ क्या कोई भी नहीं है इस वक्त घर पर।
मैंने गुस्से में सुदीप को घूरा और सोफे से तुरंत उठ खड़ी हुई। तो तुमने झूठ बोला ना?
सुदीप : तो क्या करता। तुम्ही बोलो। नहीं तो तुम घर आती क्या?
यही एक सही रास्ता सूझा मुझे।
सुनो थोड़ी देर के लिए तो बैठो। कुछ कहना है तुमसे।
मैं भीतर ही भीतर एक अनजाने से कशमकश में और घबराई हुई थी। इसलिए भी कि हम दोनों के अलावा घर पर कोई नहीं था। कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा मेरे बारे में?
अजीब अनोखे सवालों के घेरे में मैं खुद को सिमटा हुआ असहज महसूस करने लगती हूँ।
सुदीप भाँप जाता है। मुझे विश्वास दिलाता है। डरो मत मैं हूँ ना। खुद से अधिक विश्वास कर सकती हो मुझे पर।
इतने दिनों से सुदीप को आते जाते देखती थी। आज बिल्कुल करीब बैठा था और बदतमीजी जैसी कोई हरकत बिल्कुल भी नहीं। तभी सुदीप बिना समय गंवाए एक हल्का गुलाबी रंग का लिफाफा थमा देता है मुझे।
अब मुझे समझ में आने लगा कि सुदीप ने सबकुछ पहले से तय कर रखा था। लिफाफा काफी खुबसूरत था। उसमें महीन आड़ी और खड़ी रेखाएं शायद हल्की सफेद धारियां (चेक लाइन्स) थी। उस पर एक स्केच बना हुआ था। एक पुराना दरख़्त। जिसके शाख और पत्तों पर कुछ चिड़ियांँ बैंठी थी। यह स्केच गुलाबी लिफाफे के किनारे पर हाथ से काले रंग के पेन से बना हुआ था। ऐसा लगता था कि वह दरख़्त कितनों का आशियाना है और सुदीप के प्रेम का भी।
इतना सुंदर? मेरी आँखें सुदीप से सवाल कर रहीं थी।
क्या तुमने? मैंने अपने नपे तुले शब्दों, हाथ और आँखों के इशारे से पूछा।
हाँ तो कौन बनाएगा? क्या किसी और से बनवाऊंगा तुम्हें देने के लिए?
रख लो।इसे मना मत करना। रख लो ना। घर जाकर ही खोलना। लिफाफा देते हुए सुदीप काफी करीब था।
फिर वही मुस्कान के साथ मुझे जाने की इजाजत दे देता है। मेरे लंबे नाखूनों को घूरते हुए फब्तियां कसता है। देखो मेरे को ना तुमसे और तुम्हारे नाखूनों दोनों से बहुत डरता लगता है। सच बोल रहा हूँ।

अपनी भावनाओं को दबाते हुए मेरे लंबे नाखूनों की तरफ देखते हुए हंसने लगता है। उस समय मेरे आँखों से आँसू लुढ़कते उससे पहले मैं खुद को संभाल लेती हूँ।
सुदीप की मासूमियत और पौरूषत्व दोनों में काफी आकर्षण था। उसके अनुरोध को ठुकराने की कोई वजह सामने नहीं दिखाई देता है। तो लिफाफा अपने बैग में किताबों के बीच में दबाकर हिफाजत से रख लेती हूँ।
नजरों से ही जा रही हूँ कहते हुए दरवाज़े की ओर घुमती हूँ। लेकिन आज जाने क्यों मेरा मन कह रहा था मुझसे कि, रोक लो सुदीप, रोक लो कुछ और पल के लिए मुझे। एक बार मेरा हाथ पकड़कर रोक सको तो रोक लो। मैं रुक जाऊंँगी। लेकिन दोनों ही एक अनजाने डर से बंधे थे। दिल की बात जुबां तक लाना नामुमकिन सा था। जमीन पर गड़ी नजरों के साथ मैं बहुत ही घबराई हुई थी। मैं दबी कदमों, भारी मन से सुदीप के घर से बाहर आ जाती हूँ। सुदीप मुझे गेट तक छोड़ अपने घर के अंदर जा चुका होता है।
मैं आधे मन से एक पूरा लिफाफा के साथ अपने घर पहुंचती हूँ। आखिर लिफाफे में क्या हो सकता है? सवालों के भंवर में लिपटी लिफाफे को छूती और महसूस करती। हम्म् अंदर एक कार्ड जैसा कुछ तो है।
यह छूकर या लिफाफे को ऊपर उठाकर रोशनी में देखकर पता चल रहा था। उन दिनों चाहे नव वर्ष हो, होली, दशहरा, दीवाली हो या कोई भी शुभ अवसर हो शुभकामनाएंँ अथवा अपने दिल की बात प्रेषित करने के लिए ग्रीटिंग कार्ड्स एक मात्र विकल्प हुआ करता था। नव वर्ष पर तो कार्ड्स खरीदने के लिए दुकानों में अच्छी खासी भीड़ हुआ करती थी।
अब मुझे लिफाफे के अंदर ताकझांँक से ऊपर उठकर उसके अंदर क्या है यह देखने की जिज्ञासा और कौतूहुलता बढ़ती ही जा रही थी।
आखिर एक दिन बाद किसी तरह धीरे से लिफाफा बड़े अदब से खोलती हूंँ।
अंदर छोटा सा एक कार्ड था। जिसमें बेहद खूबसूरती से एक दिल और दिल से गुजरात हुआ एक तीर का रेखांकन चित्र बना हुआ था और पेन से लिखा था आइ लव यू अनू। तुम्हारा —
मुझे तो काटो तो खून नहीं जैसे लग रहा था। अजीब हालात से पहली बार गुजरी थी। सांसें वहीं के वहीं रुक गई। सब कुछ मानों जम सा गया था।
मैं कोशिश कर रही थी कि अपने आपको सामान्य करूं। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे नसों में प्यार ने इन्कलाब छेड़ दिया हो। सप्तक में प से प्रेम झंकृत हो उठा था। बहुत मशक्कत करनी पड़ी थी अपने आप को सहज करने के लिए याद है मुझे। जैसे तैसे लंबे अंतराल के बाद आंतरिक द्वंद फिलहाल के लिए तो टलता है और दिल का भंवर शान्त होता है।
फिर दिमागी कार्यवाही शुरू होती है। सुदीप एक अच्छा कलाकार है। रचनात्मक लोग काफी मृदुल होते हैं। यह भी उस दिन जान पाई थी कि बाहर से दिखने वाले अंदर से भी वही होंगे यह कतई जरूरी नहीं।
लेकिन अब मन को उजास की जरूरत थी। क्योंकि यह उम्र थोड़ी सी अल्हड़ और थोड़ी सी समझदारी वाली थी। प्रहर अपने समय से पृथ्वी पर दस्तक देता रहा। सुबह, दोपहर, सांझ और रात।
सुदीप से नज़र कैसे मिलाऊँ। उसने जवाब माँगा था। ग्रीटिंग कार्ड देते हुए कहा था कि तसल्ली से जवाब देना। कोई जल्दबाजी नहीं करना।
सुदीप से आमना सामना ठीक वैसे ही होता रहा जैसे पहले होता था। लेकिन अबके मौसम और मिज़ाज सब बदले हुए थे। अब सुदीप से डर नहीं लग रहा था। अब रास्ते पर चलते हुए हर चीज अच्छी लगने लगी थी। पलाश, कदंब, गुलमोहर और अधिक चटख रंग में भींगे हुए से लगते थे।
समय बीतता गया। मेरी ट्यूशन खत्म हुई। लेकिन ना मैं कुछ कह पाई ना सुदीप ने ही कुछ कहने की कोशिश की।
मेरा घर से निकलना बहुत कम हो गया। कभी कभार ही बाहर आना जाना होता। सुदीप भी जवाब के इंतजार में कभी कभार दिख जाता।
बात कैसे उठी और कैसे दबी रह गई किसीको पता नहीं चला। कार्ड कहाँ गया यह याद बिल्कुल नहीं रहा। लेकिन कई सालों तक लिफाफे को संभाल कर रखा था मैंने। क्योंकि सुदीप के हाथों से बना स्केच था उसपर। वह मात्र मोटे कागज़ का टुकड़ा नहीं था वरन् एक उत्कृष्ट कलात्मक स्मृति चिन्ह था मेरे लिए। किसी की भावनाएँ उकेरी गई थी उसमें। तो निश्चित ही वह अमूल्य था।
अन्विता की उंगलियांँ फिर से कुछ पीले पन्नों पर थिरकते हैं। पन्नों को पलटते हुए अन्विता खिड़कियों से झाँकते उस चाँद को देखते हुए कहती है, सच ही तो है, किसी से प्रेम करने के लिए उसका पास होना कब जरूरी है। इस लिफाफे से उतनी ही मोहब्बत है जितना दूर बैठा उस चाँद से। कि लिफाफे में रची बसी वह प्रेम की खुशबू आज भी उतनी ही महकती है। किसी डियो में वह बात कहाँ!
आज सुदीप मानो गुलाबी लिफाफे से बाहर निकल आया है। रातरानी के साथ अन्विता भी अतीत के लम्हों से महक रही थी।

– अपर्णा विश्वनाथ

– अपर्णा विश्वनाथ

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