रिश्तें******



अलसुबह पड़ोस की कान्ता आंटी के चिल्लाने की आवाज से वातावरण और मोहल्ला गुंजायमान था। बच्चें, स्कूल जाने, पेरेंट्स अॉटो,रिक्शा, बस तक बच्चों को छोड़ने, सफाई कर्मचारी रास्ता घाट बुहारने में, अखबार वाला अखबार बाँटने में, सभी अपने में उलझे। सुबह सुबह की आपाधापी में किसे फुर्सत।
लेकिन मुझ से रहा न गया।
क्या हुआ आंटी?
क्यों कपड़े धो रहे हैं? शांताबाई नहीं आई क्या?
अरे देखो ना आज पूरे चार दिन हो गए हैं।
— कोई खबर भिजवाई?
कहाँ। कोई खबर नहीं। ऊपर से जब अंकल उसके घर जाते हैं, तो दरवाजा भी नहीं खोलती है। पन्द्रह साल से काम कर रही थी। देखो कैसे बिन बताए। मुंह में तमाचा मारने जैसा।
ओह! यह तो हद्द है आंटी।
है ही। अब बताओ महीने के चार पांच दिन तो मैं यहाँ रहती ही नहीं हूँ। पता तो है तुम्हें। बेटों के यहाँ चली जाती हूँ। आती हूँ तो इसको भी आना चाहिए ना काम करने।
पैसे बढ़ा दो आंटी।
अरे! बढ़ा दूँगी।
जो भी बात है सामने से बोलना चाहिए ना।
फोन पर भी बात नहीं करती। जब बताएगी नहीं तो मैं क्या समझूँगी। बहुत घमंड हो गया है इसे। जानती तो हो। तुम्हें भी कैसे आडा तिरछा जवाब देती थी।
हम्म् सही बात है आंटी।
हाँ रे। अब मुझसे नहीं हो पाता है काम। एक तो वात के मारे पूरे शरीर में दर्द रहता है।
हम्म् …
देखो आंटी फिर कोई दूसरी।
मैं वापस अपने घर काम में व्यस्त हो गई। सोचते हुए कि
सत्तर- पच्चहत्तर की उम्र हो गई है अंकल आंटी की।
दूसरे दिन — फिर वही। आंटी काम करते करते अंकल पर चिल्लाती जाती। बहरा हो गया है। माँगती हूँ नीला साबून तो लाता है हरा साबून। अपनी काम की खीझ उतारती।
आंटी आई क्या कोई खबर शांताबाई की?
आंटी पसीने में लथपथ।
गुस्से में — नहीं आई।
रख लूंँगी दूसरी। पच्चहत्तर मिल जाएंगे।
फिर अंकल पर चिल्लाते हुए। अरे इसके चलते। ऐ कहीं टिकता ही नहीं है। वरना मैं तो चले जाऊँ बेटों के पास रहने। मुझसे नहीं होता अब इस उम्र में इतने बड़े घर का काम अकेले करना। अब बताओ दो-दो बहुओं के होते मुझे काम करना पड़ रहा है। सोचना चाहिए ना बहुओं को भी।
तो आंटी जब तक नई कामवाली नहीं मिलती बेटों के यहाँ चली जाइए ना।
आंटी — मुझे तो वहाँ अच्छा लगता है।
बैठ के सिर्फ खाओ। खाना बनाने वाली भी है वहाँ। लेकिन हमेशा के लिए रहूँगी तो वो प्यार और आदर थोड़े ना मिलेगा।
दो दिन बाद —
पता चला एक नई कामवाली से पैसों की बातचीत हुई और तय हुआ अगले दिन से सुबह आठ बजे से आएगी।
अगले दिन सुबह — समय दस बजे।
नई कामवाली प्रवेश करती है। लेकिन तब तक आंटी बर्तन, कपड़े और आंगन साफ कर चुकी होती हैं।
यह टाइम है आने का? ऐसा कैसे चलेगा?
नहीं करवाना तुमसे काम। आठ बजे का कहा था। दस से ऊपर हो गया है।
तभी दूधवाला आता है। आंटी सारा गुस्सा उस पर भी उतारती है। दूध नहीं पानी देते हो। नहीं चाहिए अब। बंद करवा दूंगी। तुम्हारे बाप को भेज। उसी से बात करूंगी। दूधवाले कोई अठारह उन्नीस साल का लड़का है। आखिर उसे भी गुस्सा आता है। कोई नहीं टिकेगा तुम्हारे यहाँ। अच्छा हुआ कामवाली चली गई।
लेकिन अंकल आंटी सब पर भारी। इस उम्र में भी इतनी बुलंद आवाज और पुष्पा कभी झुकेगा नहीं वाले भड़कीले तेवर। आग में घी का काम करते हैं।
तू तू मैं मैं में दोनों के बीच मामला और भड़क उठा।
पास में होने के नाते मैं आंटी को शांत करने की कोशिश करती हूँ। कामवाली को बोलती हूँ दीदी जल्दी आ जाया करो। लेकिन मामला नहीं सलटा।
कुछ दिनों बाद एक और नई कामवाली फिक्स हुई। मुझे अच्छा लगा। चलो अंकल आंटी को अब थोड़ा आराम रहेगा।
लेकिन एक बात कचोटती है मुझे कि समस्या का हल हम अपनों के पास नहीं ढूंढते हैं। समाजिक प्राणी होने के नाते हमें अपने कठिन समय में अपने आसपास के लोगों से मानसिक बल मिल जाता है। अच्छी बात है।

जैसे कान्ता आंटी को। जिन्हें अपने मजबूत आर्थिक स्थिति का बड़ा दंभ है। उन्हें दंभ है कि पैसे से सबकुछ खरीदा जा सकता है। कहती हैं पैसा फेंको तमाशा देखो। बहुत काम वाले मिल जाएंगे। लेकिन क्या अंकल आंटी को इस उम्र में अपने बच्चों और पोतों-पोतियों के पास नहीं रहना चाहिए। बहुओं की हल्की फुल्की घरकामों में मदद करते हंसते गाते समय काटना नहीं चाहिए?
आज एक कान्ता आंटी नहीं, ऐसी कितनी ही कान्ता आंटियाँ हैं जिनके बेटे बहू, वृद्ध माता-पिता से अलग रहते हैं।
क्योंकि बेटे-बहू ही अलग घर बसाते हैं तो समाज सारा दोष उन पर ही मढ़ देता है। अपने वृद्ध मातापिता को छोड़ दिया है। बहू ध्यान नहीं देती है। बेचारे इस बुढ़ापा में अकेले रह गए हैं। वगैरह वगैरह। जितनी मुंह उतनी बातें।
मैं सोचते रह गई कि बातों का क्या। कोई टैक्स थोड़े ना लगता है। जितनी करवा लो।
फिर टीवी सिरियल्स ने भी यहाँ आग में घी का काम किया। संवेदनाओं और भावनाओं को ताक पर रख सास और बहु के रिश्ते को बाजारीकरण कर तरह तरह से दर्शकों के मनोरंजन के लिए परोसा गया है।
मनोरंजन तो हुआ, लेकिन साथ ही रिश्तों में एक अनचाहा अवसाद, रिश्तों में असुरक्षा का भाव भी साथ साथ पनपता गया।
लेकिन आप कहेंगे क्यों अपनी बुद्धि घास चरने गई है क्या?
नहीं गई।
लेकिन इसे भी नकारा नहीं जा सकता कि हम अपने परिवेश से प्रभावित होते हैं और आजकल अमूमन सीरियल्स हमारे परिवेश का ही एक हिस्सा हैं इसे भी हम झूठला नहीं सकते हैं।
दोषी कौन- क्या सिर्फ बहुएँ ?
अब जमीनी हकीकत यह है कि हर हमेशा बेटे बहू ही दोषी नहीं है। बुजुर्गो के कुछ ज़िद्दीपन, रूढ़ीवादी परम्परा और दकियानूसी सोच ने सास बहू के रिश्तों में तल्खों को जन्म दिया।
हमें दोनों पक्षों के नजरिए से देखने की जरूरत है। मैंने ठानी की कान्ता आंटी से बात करूंगी।
पूछूंँगीं वजह। बेटे बहुओं के अलग होने की।
अगर आप अपने आसपास में रह रहीं ऐसे ही कान्ता आंटियों से अलगाव का कारण पूछेंगे तो आप भी पाएंगे कि बात बहुत ही मामूली सी है :-

* ज्यादातर आजकल हर ससुराल वालों को अव्वल तो लड़की पढ़ी लिखी नौकरी वाली चाहिए। अच्छी बात है। इसमें बुरा कुछ भी नहीं। लेकिन क्या बहू को भी उतनी ही सुविधाएंँ मिलती है जितना कि कामकाजी बेटों को। अधिकतर आप पाएंगे नहीं। इस बात पर कोई सुनवाई भी नहीं बहुओं की।
* चूंकि लड़की शादी के बाद ससुराल में रहती है। घर या तो ससुर जी का बनाया हुआ होता है या फिर पुश्तैनी। लेकिन आए दिन सास या ससुर की धमकी या उलाहना कि तुम दहेज़ में घर नहीं लाई हो कि, जैसा तुम चाहो वैसा करो। घर हमारा है तो हमारे कहे अनुसार रहो वरना चलते बनो। क्या बहुओं को अपने मन मुताबिक अपने कमरे को कुछ सजाने संवारने का हक़ नहीं है। उनका भी आत्मसम्मान है। जिसे ठेस पहुंचाने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए।
* घर का राशन जैसे – दाल, चावल, तेल, साबून, टूथपेस्ट और भी सारे सामान। सासू मांँ के कहे मुताबिक। हमारे यहाँ ऐसा ही लाते हैं। सालों से। तुम आज आई हो। कुछ बदलेगा नहीं। ज़रा सा सोचने की भी जेहमत नहीं उठाते कि बहू होने के पहले बहू मायके में बेटी थी। वर्षों से किसी और टेस्ट, अदब से पली बढ़ी है। अचानक बदलाव में ढलने में कभी कभी समय लगता है।
* शाम के वक्त नौकरी करके आने के बाद आपको चाय पीने का मन करे तो भी आप बिना पूछे नहीं पी सकते। सासू मांँ से बिना इजाजत के चाय काॅफी बनाने की आजादी नहीं। कैसी मानसिकता है यह। कभी परंपरा के नाम पर, कभी कुछ छुआछूत प्रथा के नाम पर, या फिर और दूसरे कारण।
* जॉब के बाद थके मांदे घर आने के बाद हर किसी को शांति भरा माहौल और अपना एक स्पेस चाहिए होता है। जो बेटों पर तो लागू होता है लेकिन बहुओं पर नहीं।
क्यों बहू कोई मशीन है। क्या वह थकती नहीं है। क्या घर आने पर एक ग्लास पानी और चाय कोई पूछता है उसे। कोई नहीं। बात छोटी सी है। लेकिन यह मतभेद, वैचारिक विभिन्नताएं ही कलह का कारण बनती हैं और अशांति उत्पन्न होने के कारणों को जन्म देता है।
* अधिकतर घरों में सुबह से लेकर रात तक यही सुनने को मिलेगा कि नौकरी कर रही है तो क्या घर के काम और तुम्हारे बच्चों को मैं नहीं देख सकती।
अधिकतर मामलों में बहू के घर में आते ही सास अपने हाथ खड़े कर देती है। या फिर बहू द्वारा किए गए कामों से नाखुश। बात बात में ताना कि यही सिखाया है तुम्हारे माँ-बाप ने।
* कान्ता आंटी कहती है मेरे परमिशन के बिना मेरे बहुओं को बेडरूम में जाने की इजाजत नहीं थी। अब सोचिए कि बहू ने हो गई कोई बंधुवा मजदूर हो गई।
कान्ता आंटी के यहाँ ऐसे ही छोटी मोटी झिकझिक ने विकराल रूप धारण कर लिया था। ऊपर से अंकल आंटी की चिल्ला चिखकर बात करने की आदत।
लेकिन प्रायः सुनने में यह आता है कि बहू बिल्कुल एडजस्ट नहीं करती।
अब सोचने वाली बात है कि क्या बहुएं इंसान नहीं है?

मैंने कहा तो आंटी आप थोड़ा एडजस्ट क्यों नहीं करती। आपकी बहुएं नौकरीशुदा हैं। आपके बेटों को आर्थिक मदद करने के लिए ही तो काम करती है ना। तो क्या थोड़ा सा शारीरिक सहायता, मानसिक सहायता,अपनापन और थोड़ा सा प्यार अपने बहुओं को आप नहीं दे सकती हैं।
कान्ता आंटी — ना बाबा मेरे से तो नहीं हो पाएगा।
क्या अब भी केवल बहुएंँ ही ग़लत हैं और अलगाव का कारण है? सवाल फिर अपनी जगह अडिग है। ऐ कैसा रिश्ता है?

-अपर्णा विश्वनाथ

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