आषाढ़_मासम् और #नखरंजनी/ #गोरिंटाकू

#आषाढ़_मासम् और #नखरंजनी/ #गोरिंटाकू
********************************
भारतवर्ष परंपराओं का देश है। परंपराओं की दुशाला लपेटे वर्ष के बारह महीने अपने में महत्वपूर्ण है। हिन्दू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के बाद आषाढ़ मास शुरू होता है। सूर्य का कर्कटक राशि में संक्रमण इसी महीने में होता है जिसे दक्षिणायन की शुरुआत माना जाता है।
भारत देश के कई राज्यों में खासकर दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश और कर्नाटका में विशेष परंपरा और रीति-रिवाजों के संदर्भ में आषाढ़ मास काफी महत्वपूर्ण है। तो पढ़िए और जानिए आप भी।

एक प्रचलित और दिलचस्प कहावत भी है आंध्र प्रदेश में कि आषाढ़ मास में गोरिंटाकू(मेहंदी) अपने ससुराल चली जाती है।
लेकिन असल में एक महीना (पूरा आषाढ़ मास) नवविवाहिताओं को अपने मायके जाने और वहीं रहने की परंपरा है क्योंकि पूरे आषाढ़ मास सास-बहू (नवविवाहित) एक चौखट नहीं लांघ सकते हैं। अब इसका क्या तुक है पता नहीं।

फिर इस आषाढ़ मास में महिलाओं के गोरिंटाकू (मेहंदी) लगाने का चलन है। कम से कम एक बार तो लगाना जरूरी है। वो भी आकू मतलब पत्ते वाली मेहंदी। समृद्ध वैवाहिक जीवन और सुहाग के लिए। मेहंदी सुहाग का प्रतीक माना जाता है।
बेवजह कुछ भी नहीं है। हमारी हर परंपरा सांइटिफिक भी है।
इस तरह की हर बात, बचपन से लेकर आज तक मेरी माँ मुझे प्रूफ और रीज़न के साथ बताती आई है।

तो, माँ जहाँ तक संभव हो पत्ते वाली मेहंदी सिलबट्टे (grinding stone गोल गोल घुमाने वाला ) में पीसती थी। एक हाथ पीसते हुए ही लाल नारंगी हो जाता था। एक हाथ सादा बचाकर रखती ताकि चंदा मामा और छोटे बिंदुओं से हाथ भर सकें।
…लगा लेना। खासकर नाखूनों में भी, कहकर माँ हमलोगों को भी रात में एक गोला मेहंदी का दे देती। पैर की तली में भी लगाने की हिदायत देती‌।
मैं झिकझिक करती। नहीं लगाउंगी कहती। तब माँ साइंटिफिक रीज़न देती —
आयुर्वेदिक औषधि के रूप में
************************
* लगभग तीन-चार महीने कड़क गर्मी को झेलते हुए हमारा शरीर भी काफी उष्ण हो जाता है। हाथ-पैर की तली में मेहंदी लगाने से शरीर की उष्णता कम होती है। क्योंकि मेहंदी की तासीर ठंडी होती है। उष्णता खींच लेती है।

* ठंडक एहसास और मेहंदी की खुशबू। अहा!

* आषाढ़ मास मतलब बारिश की शुरुआत। जलवायु में अत्याधिक परिवर्तन होता है। पहले कच्चे पक्के मकान और महिलाओं का सारा दिन रसोईघर और पानी के कामों में बीतता था। हाथ और पैरों में पानी से फंगल इन्फेक्शन (जिसे साधारण भाषा में पानी लग जाना या पानी खा जाना कहते हैं) की समस्या आम होती थी।
मेहंदी एक आयुर्वेदिक औषधि है। मेहंदी का रस त्वाचा के अंदर जाकर प्राकृतिक रूप से एक एंटीबायोटिक का काम करती है। साथ में नाखूनों को खराब होने से,उसमें पस भरने से भी बचाती है। आषाढ़ महीने में मेहंदी की औषधीय गुण बढ़ जाती है।
प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन
********************
* मेहंदी का संस्कृत नाम नखरंजनी है। नाम में ही सब कुछ निहित है। नख – नाखून, रंजनी – रंगने वाला। यह प्रकृतिप्रदत्त नेलपॉलिश है। वो भी बिना साइड इफैक्ट के।
तो उन दिनों जब आर्टीफिशियल नेलपॉलिश नहीं हुआ करते थे तो महिलाएं नखरंजनी से ही अपने नाखूनों को रंगती थी।
* मेहंदी के रंग से हाथों और पैरों की खूबसूरती तो देखते ही बनती है।
* नाखूनों के साथ बालों में रंगने का प्राकृतिक संसाधन है मेहंदी।
* मेहंदी एक अच्छी हेयर कंडीशनर भी है।

पहले के समय में पत्ते मेहंदी पीस कर बाँटने की भी परंपरा थी जो आज भी दक्षिण भारत में चलन में है। माँ बताती है कि कैसे बचपन में उनके हाथ मेहंदी बांँटते बांँटते आधी रंग जाया करती थी।

तब रहीम का यह दोहा याद आता है मुझे —

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥

-अपर्णा विश्वनाथ

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s