अमलतास

चुभती धूप/तपती सड़कों पर/
सरपट भागते हुए लोग है
लेकिन एक मोड़ पर
उस पीले झूमर तले/उससे टपकते चटकीले पीले रंग से/पीताम्बरा की मौजूदगी से/
सदियों से बेज़ार एक घर/कुछ खंभे/और लाल दिवारें/
आज गुलज़ार है/
अहा! पीताम्बरा
गोया,
सूरज ने/अपना पूरा पीला रंग/तुम पर ही उड़ेल दिया है/

बेसाख्त ठहर जाती हूँ…
न न ठंडी छांव के लिए नहीं/
बस कुछ सुस्त लम्हों को ढूंढने/ कुछ रुका हुआ दर्द बताने ,
लेकिन
मेरी मौजूदगी की/इसे क्या ख़बर /
औचक, टहनियों से/बेशुमार फूलों की पंखुड़ियांँ छलक/
कुछ हथेलियों पर/और कुछ कानों पर आकर/
क्यों, फासलों में भी तो जिन्दगी है/
कहते हुए ठहर से जाते हैं।

-अपर्णा विश्वनाथ

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