#शुभकामना_सन्देश”””””””””””””””””””””””कभी कभी छोटी सी बात हमारे मन को छू जाती है।वैसे तो मैं व्हाट्सएप युनिवर्सिटी पर अग्रेषित शुभकामनाओं वाले सन्देशों के पुनःअग्रेषण से बचती हूंँ।अग्रेषित सन्देशों का इधर से उधर करना मात्र औपचारिक और खानापूर्ति जैसा लगता है।बगैर लागलपेट कहूँ तो, फारवर्ड मेसेज को फिर से फारवर्ड करना मुझे कम ही भाता है। कल भी अधिकतर शुभचिंतक अपनी भावनाओं और अभिलाषाओं को अग्रेषित सन्देशों द्वारा व्यक्त कर रहे थे। मंगलकामनाएंँ इस पार से उस पार और उस पार से इस पार हो रहें थे। मैं अपने नियामक को तोड़ते हुए कहीं से आए अक्षय तृतीया(आंग्ल भाषा में) के सन्देश को कुछ अपनों को अग्रेषित कर देती हूँ। प्रत्युत्तर में अधिकांश वही वही अग्रेषित सन्देशों की भरमार।लेकिन एक प्रत्युत्तर कि :आपको भी अक्षय तृतीया की बधाई मैडम।”आप धन संपदा की स्वामिनी बनी रहें और उसकी हवा हम तक भी आती रहें।” पढ़ते हुए लगा सचमुच कोई दुआ (अस्पृश्य) मुझ तक पहुंच रही है।यह शुभकामना सन्देश भी कुछ शब्दों का मेला ही तो था।लेकिन…बहुत ही निश्छल मन से उकेरा हुआ।अद्वितीय। मन को कहीं स्पर्श कर गया।सोने चांदी का सुख तो भौतिक है,नश्वर है।वहीं प्रार्थना और दुआओं का सुख आत्मिक है। बहुत फर्क है दोनों में। सोचिएगा इसके बारे में।इसलिए दुआएं देते रहिए और लेते भी रहिए।यही शाश्वत है। धन्यवाद दोस्त 🌺-अपर्णा विश्वनाथ

2 thoughts on “#शुभकामना_सन्देश”””””””””””””””””””””””कभी कभी छोटी सी बात हमारे मन को छू जाती है।वैसे तो मैं व्हाट्सएप युनिवर्सिटी पर अग्रेषित शुभकामनाओं वाले सन्देशों के पुनःअग्रेषण से बचती हूंँ।अग्रेषित सन्देशों का इधर से उधर करना मात्र औपचारिक और खानापूर्ति जैसा लगता है।बगैर लागलपेट कहूँ तो, फारवर्ड मेसेज को फिर से फारवर्ड करना मुझे कम ही भाता है। कल भी अधिकतर शुभचिंतक अपनी भावनाओं और अभिलाषाओं को अग्रेषित सन्देशों द्वारा व्यक्त कर रहे थे। मंगलकामनाएंँ इस पार से उस पार और उस पार से इस पार हो रहें थे। मैं अपने नियामक को तोड़ते हुए कहीं से आए अक्षय तृतीया(आंग्ल भाषा में) के सन्देश को कुछ अपनों को अग्रेषित कर देती हूँ। प्रत्युत्तर में अधिकांश वही वही अग्रेषित सन्देशों की भरमार।लेकिन एक प्रत्युत्तर कि :आपको भी अक्षय तृतीया की बधाई मैडम।”आप धन संपदा की स्वामिनी बनी रहें और उसकी हवा हम तक भी आती रहें।” पढ़ते हुए लगा सचमुच कोई दुआ (अस्पृश्य) मुझ तक पहुंच रही है।यह शुभकामना सन्देश भी कुछ शब्दों का मेला ही तो था।लेकिन…बहुत ही निश्छल मन से उकेरा हुआ।अद्वितीय। मन को कहीं स्पर्श कर गया।सोने चांदी का सुख तो भौतिक है,नश्वर है।वहीं प्रार्थना और दुआओं का सुख आत्मिक है। बहुत फर्क है दोनों में। सोचिएगा इसके बारे में।इसलिए दुआएं देते रहिए और लेते भी रहिए।यही शाश्वत है। धन्यवाद दोस्त 🌺-अपर्णा विश्वनाथ

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