#coffee #Polsan #Amul

कल तुम से जुदा हो जाऊंगा वो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ…
“”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””
आज नाॅर्थ साइड में हममें से अधिकतर लोग काॅफी में नेशले ब्रू की इंस्टेंट कॉफी या फिल्टर कॉफी में ब्रुक बाॅण्ड ग्रीन लेबल ही पीते हैं। वैसे तो कई और ब्रांड है। लेकिन यह आम इंसानों के बजट में आ जाता है। शायद यही कारण होगा या हो सकता है कि मेरी जानकारी में सिर्फ यही है। वैसे साउथ में आॅप्शन्स है।
अव्वल … कि कॉफी बीज प्रचुर मात्रा में स्टोर्स में उपलब्ध होते हैं साथ ही वहाँ कॉफी मिल्स बहुतायत है तो बिना ब्रांड वाली अच्छी कॉफी गलियों में भी बिना दिक्कत मिल जाती हैं।
मैं दो-तीन ब्रांड यूज़ की हूँ। उनमें ग्रीन लेबल ही अच्छा लगा। क्योंकि उसकी खुशबू (अरोमा) दूसरे की अपेक्षा बहुत अच्छी है। हर घूंट के साथ वह एक अरोमा।
अहा ! या फिर यही आदत में है इसलिए भी। तीसरी बात यह भी कि फिल्टर कॉफी की कोई दूसरी ब्रांड स्टोर्स में दिखती ही नहीं है।
यही सब बातें एक दिन माँ के साथ हो रही थी। पता चला कि ग्रीन लेबल की उपलब्धता उनके यहाँ आसपास किराना स्टोर्स से नदारद है। मैंने बोला माँ दिक्कत तो हमारे यहांँ भी है। डी-मार्ट में भी नहीं है तो अमेज़ाॅन से खरीदना पड़ा मुझे। करोना काल में कुछ कुछ चीजों की आमद बाजार में कम हो गई थी।
तब माँ ने बातों बातों में कहा कि बचपन में उनके यहाँ उनकी माँ (मेरी नानी ) या तो काॅफी बीज भुंजवा के पिसवाती थीं या फिर नाना जी पोलसन काॅफी मंगवाते थे।
मैंने कहा फिर से बताना माँ !
यह नाम पहली बार मेरी कानों ने सुना। माँ कही … हाँ पोलसन POLSAN … बकायदा स्पेलिंग याद है माँ को। ओह ! ऐसी भी कोई ब्रांड है ?
कौन से साल में रहा यह। अंदाज़न बता सकती हो माँ ?
माँ बोली अब है कि नहीं मुझे नहीं मालूम। मेरे बचपन की बात है। कोई पैंसठ साल पीछे की ।
ओह ! पोलसन को जानने की उत्सुकता जागी। गूगल अंकल को पूछी।
और फिर क्या ! सब कुछ सामने।
आज घर घर में अमूल बटर है लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके अस्तित्व में आने से पहले देशभर में सिर्फ ‘पोलसन बटर’ का बोलबाला था। जिसके मालिक थे पेस्तोनजी इडुलजी दलाल। मशहूर होने से पहले, ‘पोलसन’ बॉम्बे (अब मुंबई) में एक कॉफ़ी बनाने की दूकान हुआ करती थी। साल 1888 में, लगभग 13 साल की उम्र में पेस्तोनजी इडुलजी दलाल ने कॉफी भूनने और पीसने के लिए एक स्टोर खोला था। द अमूल इंडिया स्टोरी के इतिहासकार, रुथ हेरेडिया के मुताबिक, इडुलजी ने अपनी बहन से 100 रुपए उधार लेकर, अपना कारोबार शुरू किया था। उन्होंने, आठ रुपए महीने किराये पर एक स्टोर खोला। एक हाथ से चलने वाली मशीन से यहाँ कॉफी को पीसा जाता था और फिर इन्हें ब्राउन पेपर में पैक करके घर-घर बेचा जाता था।
1945 तक, पोलसन बटर (Polson Butter) का उत्पादन सालाना तीन मिलियन पौंड तक बढ़ गया था। पोलसन, बटर का पर्यायवाची कुछ ऐसे बन गया, जैसे ‘ज़ेरॉक्स’ और फोटोकॉपी। इसके अलावा, बताया जाता है कि कश्मीर में चापलूसी करने को ‘पोलसन लगाना’ कहा जाता था।
साल 1946 में, अमूल अस्तित्व में आ गया। लेकिन, बाजार में आने के बाद भी काफी समय तक अमूल, पोलसन (polson butter) की बराबरी नहीं कर पाया।
बाद में अमूल की मार्केटिंग रणनीति और ग्राहकों के मुताबिक उनके स्वाद ने उन्हें बाजार में स्थापित करने का काम किया। इससे बाजार में पोलसन (polson butter) का बोलबाला कम होने लगा था। इडुलजी के एकाधिकारवादी तरीकों ने आखिरकार उनके अस्तित्व को ही खत्म कर दिया और अमूल ने अपनी निष्पक्ष और बेहतर रणनीति से बाजार में अपनी जगह बनाई। 70 के दशक तक, इडुलजी के बच्चे बाहर चले गए और उनकी कंपनी को आगे ले जाने के लिए कोई नहीं बचा था। इसके बाद, कंपनी बिक गयी और यह चमड़े के उत्पादों का निर्माण करने लगी।

कहने सुनने और दस-बीस लाइन्स में खत्म होती यह दास्तान। आज किस्सा का हिस्सा बन गई है।
एक जमाने में यह कितनों की पहली सुबह का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी। जिसके बगैर सुबह की कल्पना करना नामुमकिन सा हुआ करता था।
फ़्रेंच काॅफी कैसे नाम आया यह भी पता चला।
बहुत रोचक।
माँ को किसी दिन फुर्सत में सारी कहानी सुनाई।
थोड़ा उदास होते हुए बोली, ओह ! मुझे तो आज तुमसे पता चला।
उदास होना वाजिब भी था। क्योंकि भावनाएं जो जुड़ी हैं उन किस्सों में।
अपने गाँव का रुख़ करते हुए माँ फिर फ़्लैश बैक में चली जाती है। अपने गाँव और बचपन के पलों में खो कुछ और हकीकत जो अब किस्सा बन गएं, सुनाती है।
मैं ढूंढती हूं फिर एक बार।
क्या आपने कभी ऐसा कुछ ढूंढा है ?
सच मानिए, यह जानकार कि वह आज किस्सा का हिस्सा क्यों हुए ? अच्छा लगेगा। वह हमारे सुख दुःख का ही हिस्सा लगेंगे।

खैर, समय बड़ा बलवान।
वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ
कल तुम से जुदा हो जाऊंगा वो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ…
यह गाना गुनगुनाते हुए मैं माँ से वार्तालाप विराम करती हूँ।

टीप : आप लोग भी पूछ कर देखिए न कुछ उनके बचपन के ब्रांड्स। उनके किस्से

फोटो, जानकारी गूगल साभार।

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s