मेरी अंतराष्ट्रीय (मातृभाषा)”””””””””””””””””””

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मुझे अच्छी तरह से याद है बचपन में हमारे यहांँ कहीं न कहीं से पत्र व्यवहार आते ही रहते थे।
हम भाई-बहन छोटे होने के बावजूद चिट्ठियों का भरपूर आनंद उठाया करते थे। मनोरंजन था हमारे लिए।
चाहे वो हमारे मतलब के हो न हो, सबसे पहले पढ़ने की होड़ हम भाई-बहनों में होती।
डाकिये के सायकिल की घंटी की आवाज़ आई नहीं, हम सब दरवाजे पर लपक पड़ते।
माँ मांगती रह जाती लेकिन …मजाल है कि वो हम लोगों से पहले पढ लें।
न… हो ही नहीं सकता। पहले ही हम भाई बहन बड़े प्यार से जवाब दे देते थे…
देखो ! तुम्हारे भाई की चिट्ठी है तो क्या हुआ ? वो हमारे मामा भी तो हैं !
हम सब भाई-बहन पहले पढ़ते, आखिर में माँ को थमा देते। लो पढ़ लो।
माँ भी बिचारी सोचती जाने दो बच्चें तो हैं।
गुस्सा होके भी कोई मतलब नहीं,…
कुल मिलाकर ऐसे ही सारे रिश्तों की शुरुआत हमसे ही होती और माँ चुपचाप अपनी बारी का इंतजार करती।
बाबा (पिताजी) भी कभी डांट-डपट नही करते। शांत मन से हमारे क्रियाकलापों को देखते रहते थे… न्यूट्रल
लेकिन बात यहाँ खत्म नहीं होती है।
ट्विस्ट इधर था …
हाँ! चिट्ठी पहले पढ़ने की होड़ में हम हमेशा कामयाब नहीं हुए।
कुछ रोड़े थे। हमारी पूरी जीत में अधूरी कामयाबी का सेहरा तीसरी भाषा में हमारी अज्ञानता को जाता था। हमारी करतूतों पर कुछ यूं अंकुश लगाती तीसरी भाषा …
कि जब कोई चिट्ठी पत्री तेलुगू में होती तो चिट्ठी पहले पढ़ने की होड़ में हम पीछे रह जाते। ओफ्फ् … अफसोस हमारी जीत अधूरी रह जाती।
वह तीसरी भाषा हमारी मातृभाषा। बिहारी मोहल्ले में पले बढ़े तो बिहारी पहली, स्कूल जाकर दूसरी भाषा बांग्ला,
हिन्दी,अंग्रेजी हो गई। यही मातृभाषा लगे हमें। चौबीस में चौबीस घंटे इन्हीं भाषाओं का इस्तेमाल करते थे हमलोग …
तो अपनी मातृभाषा तेलुगु पढ़ने का तुक समझ ही नहीं आया हम भाई बहनों को ।
माँ लाख समझा थक गई। लेकिन हम मूढ़ मति भाई बहन नहीं सीखना तो नहीं सीखना।
शांत सहनशील हमारी माताराम सही समय के इंतजार में कि कभी तो आएगा समय।
हमारे घर के पत्र व्यवहार प्रायः त्री भाषिय रहें। हिन्दी, अंग्रेजी और तेलुगु (मातृभाषा)
जिस दिन चिट्ठी पत्री तेलुगु में आती, हम निहायती शरीफ बच्चे बन कर चिट्ठी लेकर सीधे माँ के पास भागते। वह दिन माँ का होता। माँ की पूरी जीत दर्ज होती।
माँ त्री-भाषी और हम भाई-बहन द्बी-भाषी।
फिर क्या माँ, व्यंग्य से अपनी भृगुटी को उपर तान के बोलती , लो लो पढ़ लो ना।
हम्म्म… अब हमारे चुप रहने में ही हमारी भलाई है। इसलिए माता शरणं गच्छामि… नहीं तो समाचार से वंचित रह जाऐंगे ।
पलड़ा पूरी तरह से माँ के तरफ झुका होता और हम भाई-बहन माँ की तरफ। माँ जानबूझ कर कच्चा पक्का पढ़ कर सुनाती।
माँ बोलती… अपनी ही मातृभाषा को पढ़ पाने में असमर्थ मेरे होनहारों। माँ का कटाक्ष समझ तो आता था।
लेकिन क्या करें!! हा
यह सिलसिला यूं ही वर्षों कायम रहा।
तेलुगु में चिट्ठी पत्री आती तो माँ का सवा सेर वाला व्यवहार और कटाक्ष ….और फिर माता शरणं गच्छामि।
आखिर में माँ ने जीत दर्ज।
समय चक्र घूमा। एक दिन मैं जैसे तैसे अपनी मातृभाषा सीखने को तैयार हो गई। चॉक और स्लेट का इंतजाम झटपट किया गया।
वैसे भी माँ पहली गुरु होती है। आज और एक बार सिद्ध हो गया। बात बनती गई।
फिर आलम यह हुआ कि जल्दी सीखने की जुनून में मैंने फर्श को ही स्लेट बना खूब अभ्यास करने लगी। इसी दौरान स्कूल कालेज स्टार्ट हो गई। बस मेरी मातृभाषा कक्षा पर विराम सा लग गया।
मात्र सात दिनों के क्लास में माँ ने मातृभाषा का अक्षर ज्ञान करवा दिया। लगने लगा कि कोई अंतराष्ट्रीय अक्षर पढ़ना और लिखना आ गया मुझे। बाद में जब समय मिलता माँ काम करते करते छोटे छोटे शब्द जोड़ना और पढ़ना सीखाती।
परिणाम निकला कि मैं तीन भाषाएं पढ़ और लिख पाने में समर्थ। थोड़े और दृढ़ भी। उस समय तेलुगु भाषा अंतरराष्ट्रीय भाषा के समान लगी। मातृभाषा को इससे कम कैसे आंके।
इसका सारा श्रेय माँ के हार न मानने वाले जज़्बे और बाबा के प्रोत्साहन को जाता है।
नमन् मेरी माँ के कटाक्ष को भी जिनसे हमेशा हमें कुछ अच्छा और नया सीखने का किक मिलता रहा है।

-अपर्णा विश्वनाथ

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