मैं और बापू ३०जनवरी २०२२”””””””””””””””””””””

#मैं_और_बापू #३०_जनवरी_२०२२
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#बापू, आजादी के वर्षों बाद भी शिक्षा की स्थिति क्या कुछ बदली है। लगा आपको बता ही दूंँ। Telecom Tariff 66th Amendment Order 2022: टेलीकॉम रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) ने यह फैसला दिया है कि टेलिकॉम कंपनियों को अब रिचार्ज प्लान की वैधता 30 दिन की करनी होगी। ख़ुशी हुई आपको?
(बापू : तो अंतर्जाल “शिक्षा और छात्रों के लिए फ्री”पूरी तरह से होगा।)
नहीं नहीं… ऐसी कोई योजना नहीं है। अलग-अलग डेटा प्लान है। फ्री जैसा कुछ भी नहीं।
बापू आपके समय में मैकाले महाशय थे। हमारे समय में अंतर्जाल कंपनियों वाले महाशय हैं। इनकी ही चलती है। मैकाले से कम नहीं बल्कि् दो हाथ ज्यादा ही निकले यह।

फीस के साथ-साथ पालकों पर इसका व्यय किसी अधिभार से कम नहीं है। मरता क्या न करता वाले हालात है। क्योंकि बच्चों के भविष्य के साथ शायद ही कोई पालक समझौता करें।
अब तीन साल से शिक्षा का पूरा दारोमदार अंतर्जाल(इंटरनेट) पर ही टिका हुआ। दूसरा कोई मार्ग भी तो नहीं दिखता।
आपके सपनों का क्या ? अनिवार्य शिक्षा, मुफ्त शिक्षा (बुनियादी शिक्षा/ नई तालीम) और फिर आत्मनिर्भरता प्रश्नचिन्ह लग रहा है मुझे तो।
बापू : मुफ्त शिक्षा में छात्रों के लिए फ्री डेटा भी शामिल होना चाहिए !
हम्म्म्…अब यह तो सरकार और अंतर्जाल की कंपनियों और शिक्षा विभाग को सोचना चाहिए।
बापू आपने अपने समय में कहा था कि हमारे शिक्षातंत्र की हालत मीराबाई के भजन कि उस कड़ी की तरह हो गई है जिसमें कहा है-
‘उड़ी गयो हंस, पींजर पड़ो तो रहयु’
मैकाले की दी हुई आत्मा कालग्रस्त हो गई है, तब भी उसका हाड़-पिंजर खींचा जा रहा है और उसी में स्थापित स्वार्थ का अनुभव करते हैं।
बापू स्वराज और लोकतंत्र में शिक्षा पद्धति बदली तो है। लेकिन शिक्षा की आत्मा वही मैकाले की ही रह गई है। अब शिक्षा और शिक्षण पूरी तरह से अंतर्जाल कंपनियों के जाल में उलझकर रह गई है।
हाल तो और भी बदहाल हुए हैं।
मैकाले नहीं है तो क्या हुआ ?…. बापू,
अब शिक्षा अंतर्जाल पर निर्भर हो गई है जिसने बुनियादी शिक्षा की बुनियाद को ही हिला कर रख दिया है।
बच्चें तीन सालों से अपने घरों पर बैठ शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
शिक्षा पर मानो ग्रहण लग गया है कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी।
आपने कहा था कि किसी देश की राष्ट्रीय शिक्षा-पद्धति’ की जड़ में देखें तो पता चलेगा कि उसके भीतर एक खास श्रद्धा,खास दृष्टि और उसके अनुरूप प्रयोजन और उद्देश्य छिपे हुए रहते हैं।
शिक्षा पद्धति उस से विकसित होती है और अपना स्वरूप ग्रहण करती है। जैसी श्रद्धा दृष्टि होगी, वैसा ही कालांतर में उसका स्वरूप हो जाएगा।
आजकल हमारे यहां जो शिक्षा पद्धति प्रचलित है, उसकी श्रद्धा जैसी दृष्टि भी मैकाले से कम प्रभावित नहीं लगती है।
सारी इंटरनेट कंपनियों की आमदनी और ताबड़तोड़ लाभ। फिर जाए शिक्षा चुल्हे में।
विचारणीय मुद्दा तो यह है कि जिनके पास अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पैसे नहीं हैं, वह कहाँ से खरीदें इंटरनेट और डेटा प्लान लें। सही मायने में गाँव, बस्ती तथा दुर्गम क्षेत्र के लोगों तक क्या अंतर्जाल वाली शिक्षा पहुंच रही है।
आपने कहा था कि शिक्षा नीति का प्रयोजन … सारे देश के लोग स्वतंत्र, समझदार और उद्यमी बनकर सच्चे लोकतंत्र को जन्म दें।
आज शिक्षा की स्थिति और स्तर को देखकर मुझे तो कतई नहीं लगता है !
यह नाराजगी नहीं है। हाँ चिंतित ज़रूर हूँ।

आपको सादर नमन्
आपकी
-अपर्णा विश्वनाथ

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