मृत्यु और शहर बनारस ( मृत्यु एक उत्सव)

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मृत्यु और शहर बनारस ( मृत्यु एक उत्सव)
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अभी काशी करवट मन्दिर के अजीबो-गरीब किस्से- कहानियों के वैचारिक-द्वंद्व से हम निर्द्वन्द्व भी नहीं हो पायें थे कि औचक,… नज़र कुछ ही दूरी पर स्थित मणिकर्णिका से उठते धुएं और आग की लपटों पर पड़ती है। ।
फिर जाने क्यों उस दिव्य महाश्मशान को देख अनायास ही मेरा अन्वेषी मन पल भर में ही शान्त हो जाता है। चिता की अग्नि अजस्र जलती रहती है कभी ठंडी नहीं होती। इसलिए यह महाश्मशान कहलाता है।
शायद/क्या उथल-पुथल से भरी सबकी ज़िन्दगी का लब्बोलुआब यही आखिर पड़ाव है।?
हम्म्म्… बस टकटकी और मौन साथ थे मेरे।
और कितने रहस्य…और कितने आश्चर्य ??
अब डग और दृष्टि दोनों एक ही दिशा जो मणिकर्णिका की ओर अग्रसर है। जाने को तत्पर और लालायित भी।साधारणतया हम हिन्दुओं में औरतें श्मशानघाट नहीं जाती हैं या वर्जित है कह लिजिए। बात जेंडर इक्वलिटी की नहीं। लेकिन हाँ यहाँ भी पुरुष-सत्तात्मक सोच हावी। बहुत सारे किन्तु परंतु।
कारण चाहे कुछ भी रहा हो। मान लिया जाए (जैसे गणित में कुछ सवाल हल करते हुए हम मान लेते हैं)शायद इसी में हम औरतों की भलाई छिपी है।
ओह ! छोड़िए इन सबको।
हमारी दीदी #ललिता_मरुवाडा की आवाज बुलंद होती है। कहाँ दिमाग खपा रहें हैं।
अजी! मुस्कुराइए… हम बनारस में है।
….मुस्कुराहट के साथ हम सभी अहिल्याबाई घाट की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए ऊपर बाएं दिशा में आगे बढ़ते हैं। पन्द्रह लोगों की हमारी पलटन में सबसे सौम्य,सरल और मधुर स्वभाव वाली हमारी #वाणी #गंटी_महापात्रुणी दीदी(ननद मेरी), बनारस में आध्यात्मिक ज्ञान का आनंद लेने, रामायण पाठ करने (नौ दिन नौ घंटे नौ मिनट नौ सेकेंड…) तथा आत्मज्ञान की खोज में आते ही रहती है। महाश्मशान मणिकर्णिका घाट के कुछ किंवदंतियों से हम सभी का आमना-सामना करवातीं हैं। पुराने बहुत से इस घाट से जुड़े किस्से…जो मणिकर्णिका घाट की महत्ता को बताते हैं, सुनाती हैं।
पौराणिक आस्था, मान्यताओं को देखने और अनुभव करने पर्यटकों का हूजूम लगा रहता है।
सभी अपने में मग्न मृत्यु को करीब से समझते, आत्मसात होते जीवन की छूटी हुई डोर को देखते हुए दिखाई पड़ेंगे।
मन को छू लेने वाली एक और बात कि यहाँ मध्याह्न समय में नहाना चाहिए। किंवदंती है कि इस प्रहर में देवी-देवता यहाँ नहाने आते हैं। वाणी दीदी की एक और बात
मुझे बड़ा चकित करती है, वह यह कि प्रातः पार्थिव शरीर लिए एक विमान की उड़ान(फ्लाइट) कलकत्ता से बनारस आती हैं। सिर्फ और सिर्फ मोक्ष प्राप्ति हेतु और यह कोई किंवदंती नहीं।
ओह-ओ ! बड़ा विचित्र है।… मन फिर प्रश्नों के घेरे में।
मतलब भर भर के पाप करो और यहाँ आके मरो…
झुंड़ से किसी की आवाज़ आती है।
किसकी… पता नहीं।
कहा न !! यहाँ दुसरे श्मशानघाट की तरह माहौल गमगीन तो बिल्कुल नहीं रहता है। गरम-गरम चाय की कुल्हड़ और उठता धुंआ (ठंड, धुंध, प्रभंजन और पावस वातावरण में आपके कलेजे को उष्णता बनाए रखने के लिए परमावश्यक ) की चुस्कियां लेते पार्थिव शरीर को अंतिम प्रस्थान देने आए लोग और हम जैसे ढेरों पर्यटक।
कुछ तो जलेबियाँ खा रहें थे।
क्या करें भई…अभी हमारी सांसों ने विराम नहीं लिया। जीना है न!
वाराणसी का यह महाश्मशान एक पर्यटक स्थल की भांति आकर्षण का केंद्र भी है। बेरोक-टोक बिना किसी विभिषिका के आप अपने परिवार के साथ अपने दृग से इस दिव्य महाश्मशान का अवलोकन कर सकते हैं।
गलियों में क़रीने से सजे लकड़ियों के गट्ठर मानो हमेशा मृत्यु के इंतजार में रहते हों।
आवाज़ आई… गोयठा( गाय के गोबर से बने कंडे, उपले)
आम, चंदन और भी अलग-अलग हैं।
जी हाँ आपके जेब और श्रद्धा भक्ति के हिसाब से जलावन की लकड़ियाँ उपलब्ध कराते दुकानदार हैं यह।
… सारी जिज्ञासाएं और उत्कंठाएँ मणिकर्णिका घाट पर जलते हुए शरीरों को देख समाप्त सी हो जाती है। जिधर-तिधर जलते पार्थिव शरीर को देख अंदर से स्तब्ध और मन सुन्न।
एक आवाज … आव्…इतनी सारी जलती हुई लाशें!
गिनो तो कितने हैं ? दो-चार…
उधर भी नज़र फेरों। वहाँ देखो।
चार-पांच चिमनियों से उठता धुंआ। जाने वहाँ कितने ?
वहाँ अलगे शवदाह हो रहा। तभी आपको छूते रगड़ते दो-चार और पार्थिव शरीर गुजर जाते हैं। गलियाँ इतनी संकरी कि आपका ध्यान भटका तो बस… श्वान, नर-मादा गायें, दुपहिया वाहनें,कोई भी टकरा सकता है। फिर गोबर पर पैर पड़ा तो शिव शिव शिव शिव…हाँ फिर महादेव का सहारा।
हम्म्म्…
बारिश होने की वजह से हर तरफ मौसम गीलेपन को मानो ढो़ रहा था। फिर भी उत्साहित लोगों का हुजूम है वहां पर।
कोई उदासी और ग़म का माहौल तो कतई नहीं।
अंत्येष्टि होती रहती है। बिना दिन-रात के विषमता के।
सोलह संस्कारों में दाह संस्कार सनातन धर्म में सबसे अंतिम संस्कार है। पंच तत्वों (अग्नि, वायु,जल, धरती और आकाश) से बना हमारा शरीर सांसारिक मोह माया से मुक्त उसी पंच तत्व में विलीन हो जाता है। मोक्ष प्राप्ति की खुशियां मनाते हैं लोग। यहाँ मृत्यु शोक नहीं वरन् उत्सव समान है।
हाँ…उत्सव।
अंत्येष्टि में शामिल होने वालों का तांता। साथ में गाजे-बाजे वाले। वहीं में लाइन से दुकानें जहाँ अंत्येष्टि के सामान बेचते स्थानीय दुकानदार। जिनका पुश्तैनी धंधा यही है।
जितनी अधिक मृत्यु की संख्या उतनी अधिक इनकी कमाई।
अब जरा सोचिए !! रोजी-रोटी का सवाल। कमाइ का सारा दारोमदार मृत्यु में टिका होना। किसी का शोक किसी के लिए हर्ष। शोक और शौक यहाँ एक सिक्के के दो पहलू लगें। जैसे जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
विचित्र लगता है न सुनने में ?। लेकिन यही जीवन चक्र है जनाब!!!
चौरसिया जी के यहांँ से हम सभी पान बनवाते हैं। मुहँ में दबाए बनारसिया पान का आनंद लेते हुए एक गली से दूसरे गली में प्रवेश कर जाते हैं।

क्रमशः•••
चित्र साभार : स्वरूप मरूवाडा

-अपर्णा विश्वनाथ

2 thoughts on “मृत्यु और शहर बनारस ( मृत्यु एक उत्सव)

  1. मणिकर्णिका घाट पर जलते पार्थिव शरीर आदि व अंत का अहसास करते हैं लेकिन वहां से बाहर निकलते ही स्तब्ध और सुन्न मन एक बार फिर से इच्छा और आकांक्षाओं की पूर्ति के जीवन की दौड़ में जुट जाता है. यहीं है जीवन का सत्य….

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    1. जी प्रमोद जी सही कहा आपने।इसलिए तो श्मशान वैराग्य कहते हैं और मणिकर्णिका तो फिर महाश्मशान है। राजा और रंक सब बराबर यहां

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