मैं और मन्नू जी (एक संस्मरण)

मन्नू जी को मैं कैसे जान पाई। सोचूं तो यह भी एक अनोखी बात रही है मेरे लिए। यूं कि साहित्य और हिन्दी से मेरा रिश्ता नाता कक्षा दसवीं के बाद लगभग खत्म सा हो गया, क्योंकि आगे मैं कॉमर्स पढ़ी और कॉमर्स की शिक्षिका बन गई। इसी क्रम में सन् २०१८ में मुझे जवाहर नवोदय विद्यालय रायगढ़ (छत्तीसगढ़) में एक्सटर्नल ड्यूटी में जाना पड़ा। दो दिन की सीबीएसई कक्षा बारहवीं बोर्ड के बच्चों का प्रेक्टिकल एक्जाम लेना था मुझे। मैं रायपुर से थी तो आने-जाने में बहुत वक्त लगता। इसलिए स्कूल के गेस्ट हाउस में मेरे रहने का इंतजाम किया गया था।
ट्रेन का अंतराल कुछ ऐसा था कि मुझे लगभग तीन दिन वहां रहना पड़ गया था। एक्जाम खत्म होने के बाद मैं वहां के काॅरिडोर में घूमते इधर उधर देखते हुए विद्यालय को बड़े चाव से सुनने समझने की कोशिश कर रही थी। इसी फेर में मैंने देखा पूरे विद्यालय परिसर में अनेकों महापुरुषों और महान हस्तियों की बातें उनके तस्वीरों के साथ टंगे हुए हैं। मैं एक एक कर सबको बारीकियों से देखती और पढ़ती गई। उनमें बहुत सी हस्तियों को बचपन में पढ़ने की वजह से जानती ही थी।
फिर एक तस्वीर के नीचे खड़ी हुई। उसमें लिखें शब्दों को पढ़ने लगी। वह पंक्तियां कुछ यह थी —
“आज राजनीति को स्वप्नों, आदर्शों और मूल्यों वाला व्यक्ति नहीं चलाता, बल्कि राजनीति खुद अपने चरित्र गढ़ती चलती हैं – ऐसे चरित्र जो अपने भीतरी निर्णय, विवेक या साहस से नहीं चलते, वरन स्तिथियों के दवाब से बनते बिगड़ते है।” — महाभोज
— मन्नू भंडारी

हम्म्म्…लंबी सांस लेते हुए , कथन के नीचे लिखे मन्नू भंडारी जी के नाम को पढ़ते हुए उनके तस्वीर पर नजर पड़ती है। बिल्कुल सहज, सरल, स्वाभिमानी और स्पष्ट व्यक्तित्व वाली फेमिनिस्ट लगी।
तो इस तरह से मेरा उनसे पहली बार साबिका़ पड़ा। हाँ ! लेकिन बात यहीं नहीं थमी। काॅरिडोर में टंगी उनकी तस्वीर को मैंने अपने सेल फोन में कैद कर लिया। रायगढ़ से घर वापस आने के बाद एक रविवार को मन्नू भंडारी जी को गूगल में खोजी। पता चला कि रजनीगंधा जो कि मेरे पसंदीदा सिनेमाओं में एक है मन्नू जी ने लिखी है और स्वामी भी। जिनके गाने और किरदार हमेशा मेरे दिल के बहुत ही करीब रहे हैं। अब तो मन्नू जी मेरी धमनियों में बहने लगी थी।
उनकी कहानियों में मुझे हर दूसरे-तीसरे स्त्री की झलक दिखाई देती। कितनी साफगोई है न इनकी कहानियों में। हिन्दी और साहित्य का स्वरूप इतना खूबसूरत है यह मन्नू जी को पढ़ने के बाद ही मैंने जाना और उनकी कहानियों में खुद के किरदार को ढूंढने लगी। लगा काश! मैं मन्नू जी से एक बार मिल सकती।
“स्त्री सुबोधिनी” पढ़ते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि यह कोई कहानी है। फेमनिज्म को मैं अगर जान पाई तो वह सिर्फ और सिर्फ मन्नू जी की कहानियां के जरिए ही। यह भी कि कैसे फेमिनिज्म को विचारधाराओं के आंदोलन के जरिए अभिव्यक्त किया जा सकता है।

प्यारी बहनों, न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बड़ी मामूली-सी नौकरीपेशा घरेलू औरत हूँ, जो अपनी उम्र के बयालीस साल पार कर चुकी है।…
…..
दो नावों पर पैर रखकर चलनेवाले ‘शूरवीर’ जरूर सरेआम मिल जायेंगे। हाँ, शादीशुदा औरतें चाहें, तो भले ही शादीशुदा आदमी से प्रेम कर लें। जब तक चाहा प्रेम किया, मन भर गया तो लौटकर अपने खूँटे पर। न कोई डर, न घोटाला, जब प्रेम में लगा हो शादी का ताला।
जाने क्यों इन पंक्तियों में मुझे हमारे आसपास के किरदार दिख रहें थे।

मन्नू_भंडारी जी को भावभीनी श्रद्धांजली।

उनकी हर कहानी, हर उपन्यास में एक संदेश।

रजनीगंधा और #स्वामी शायद ही कोई भूल पाए…

स्त्री_सुबोधिनी और आपका बंटी की कहानियाँ मेरे दिल के सबसे करीब रही…बहुत सच्ची और मन के अंदर तक छू गई। (जिससे आज तक भी मैं खुद से बाहर नहीं निकाल पाई।)

इतना जरूर कहना चाहूंगी कि हमारे जीवन में अनगिनत लोगों से बावस्ता होता है। लोग मिलते हैं। आते और चले जाते हैं। मगर कुछ ही लोग ठहर पाते हैं। मन्नू जी मेरे जीवन में ठहर गई है। बस एक मलाल ज़रूर है कि आप इतनी देर से क्यों मिली और ख़ुशी इस बात की भी है कि आप मेरे जीवन का हिस्सा जीवनपर्यंत रहेंगीं।

आपकी अपनी
-अपर्णा विश्वनाथ

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