प्रतिलिपि पर पढ़ें – “चिट्ठियाँ ( एक संस्मरण) *******************”

चिट्ठियाँ ( एक संस्मरण)
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अब इसे इंसानी फितरत ही कहेंगे कि उसे आगे बढ़ने या कुछ नया सीखने के लिए किक की जरूरत पड़ती है।
दूसरे शब्दों में किक जिनसे हमें प्रेरणा, उत्तेजना , प्रोत्साहन मिलती है वह हमारे लिए स्टीमुली का काम करते हैं।
अब आज कल के बच्चों को तो डाकिया बाबू (पोस्टमैन) से कोई सरोकार नहीं। ऐसा लगता है कि धीरे धीरे इतिहास के पन्नों और किस्से कहानियों का हिस्सा बन कर रह जाएंगे यह डाकिया बाबू लोग जैसे कौवे और कबूतर। जिन्हें अब हम सिर्फ कहानियों में सुनते हैं कि वे संदेश वाहक का काम करते थे।
डाकिया कुछ दशक पहले हमारे समाज का एक अभिन्न अंग हुआ करते थे। वो ऐसे कि …
किसी का पता पूछना हो तो बेशक डाकिया बाबू  से पूछ लिजिए फौरन सटीक पता बता दें। अब सोचूं तो लगता है कि वह खुद में एक जीपीएस सिस्टम हुआ करते थे।
चिठ्ठी पत्री , शादी के कार्ड, मनीऑर्डर, पत्रिका, टेलीग्राम इंश्योरेंस के रसीद और ना जाने कितने ही तरह के संप्रेषणों को ठिकाने तक पहुंचाने का काम डाकिया बाबू के कंधों पर हुआ करता था और खास बात यह भी कि चिठ्ठी के अंदर गए बिना समाचार का मिज़ाज भी समझ जाते थे।
लिफाफे में हल्दी लगी हो या लिफाफों से अच्छी सुगंध आ रही हो तो पक्का कुछ अच्छी खबर है।
पोस्ट कार्ड अगर काले स्याह से लिखी गई है तो, हो न हो कोई बुरी खबर किसी के यहांँ आज दस्तक देने वाली है।
मनीऑर्डर यानी, रुपए पैसे का कोई इंतजाम आया  है।
और न जाने ऐसे कितनी ही तरह के पारिवारिक बातों से रिश्ता नाता इनके कार्यकाल का हिस्सा रहे।
क्या दौर रहा वह भी‌। जब हर उम्र वाले को किसी न किसी वजह से डाकिए का इंतजार संजीदगी से रहा।
उन दिनों टेलिफोन कम ही लोगों के घरों में हुआ करता था।
अधिकतम लोगों के संप्रेषण का माध्यम चिट्ठियाँ ही हुआ करती थी।
मुझे अच्छी तरह से याद है। हमारे यहांँ भी कहीं न कहीं से पत्र व्यवहार आते ही रहते थे।
हम भाई-बहन छोटे होने के बावजूद चिट्ठियों का भरपूर आनंद उठाया करते थे।
चाहे वो हमारे मतलब की हो न हो बस सबसे पहले पढ़ने का होड़ हम भाई-बहनों में होता।
डाकिये की सायकिल की घंटी की आवाज़ आई की नहीं हम सब लपक पड़ते।
माँ मांगती रह जाती लेकिन मजाल है कि वो हम लोगों से पहले पढ लें। न… हो ही नहीं सकता।
हम सब भाई-बहन पहले पढ़ते, आखिर में माँ को थमा देते। लो पढ़ लो।
माँ भी बिचारी सोचती जाने दो बच्चें तो हैं।
गुस्सा होके भी कोई मतलब नहीं,…. जानती थी।
क्योंकि हम बच्चे बड़े प्यार से जवाब दे जाते।
तुम्हारे भाई का चिट्ठी है तो क्या हुआ❗ हमारे मामा वो पहले हैं और ऐसे ही सारे रिश्तों की शुरुआत हमसे ही होते।
बस और क्या माँ चुपचाप अपनी बारी का इंतजार करती।
बाबा (पिताजी) भी कभी डांट-डपट नही करते थे।
चलो बच्चें है । शांत मन से सिर्फ हमारे क्रियाकलापों को देखते रहते थे।
वो भी हमारा साथ दे ही देते।
लेकिन बात यहाँ खत्म नहीं हुई। हम हमेशा कामयाब नहीं हुए।
चिट्ठी पहले पढ़ने की होड़ में हमारी जीत अधूरी रह जाती थी जब कोई चिट्ठी पत्री तेलुगू में होती। हमारे घर पत्र व्यवहार तीन भाषाओं में आया करता था।
हिन्दी, अंग्रेजी और तेलुगु (मातृभाषा)
हमारी पूरी जीत में अधूरी कामयाबी का सेहरा तीसरी भाषा में हमारी अज्ञानता को जाता था।
लेकिन यहां माँ की पूरी जीत दर्ज होती थी।
माँ त्रीभाषी और हम भाई-बहन द्बी भाषी।
जिस दिन चिट्ठी पत्री तेलुगु में आती थी, हम निहायती शरीफ बच्चे बन कर चिट्ठी लेकर सीधे माँ के पास भागते।
और वह दिन माँ का होता। फिर क्या माँ व्यंग्य से अपनी भृगुटी को उपर तान के बोलती , लो लो पढ़ लो ना।
हम्म्म… अब हमारे चुप रहने में ही हमारी भलाई है। इसलिए माता शरणं गच्छामि। नहीं तो समाचार से वंचित रह जाऐंगे ।
पलड़ा पूरी तरह से माँ के तरफ झुका होता और हम भाई-बहन माँ की तरफ।
माँ बोलती… कुछ तो तुमलोग शर्म कर लो।
अपनी ही मातृभाषा को पढ़ पाने में असमर्थ मेरे होनहार बच्चें।
माँ का कटाक्ष समझ तो आता था। लेकिन क्या करें!!
यह सिलसिला यूं ही चलता रहा।
जब भी तेलुगु में चिट्ठी पत्री आती तो माँ का सवा सेर वाला व्यवहार और कटाक्ष ….फिर माता शरणं गच्छामि।
आखिर में माँ ने जीत दर्ज।
फिर एक दिन मैं जैसे तैसे अपनी मातृभाषा लिखना सीखने को तैयार हो गई। वैसे भी माँ पहली गुरु होती है।आज और भी सिद्ध हो गया था। चॉक और स्लेट का इंतजाम झटपट किया गया।क्षआलम यह हुआ कि जल्दी सीखने की जुनून में मैंने फर्श को ही स्लेट बना खूब अभ्यास की। इसी दौरान स्कूल कालेज स्टार्ट हो गई। बस मेरी मातृभाषा कक्षा पे विराम लगा।
मात्र सप्ताह भर के क्लास में माँ ने कम से कम अक्षर पढ़ना और लिखना सिखा दिया। परिणाम यह कि अगर आज मैं तीन भाषाएं पढ़ और लिख पा रही हूं तो इसका सारा श्रेय माँ के जज़्बे और बाबा के प्रोत्साहन  को जाता है।
दोनों को नमन ❤️और शुक्रिया डाकिया बाबू और चिट्ठियों का जो मेरे लिए स्टीमुली(प्रेरणा ,उद्दीपन ) का काम किया।
नमन् मेरी माँ के कटाक्ष का जिनसे हमेशा मुझे कुछ अच्छाऔर नया सीखने का किक मिलता है। आप सभी के जीवन में भी ज़रूर ऐसे कुछ लोग या कुछ घटनाऐं रहें होगें जिससे आपको किक मिला होगा ।

-अपर्णा विश्वनाथ

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