महिला समानता दिवस ****************


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। “मनुस्मृति” — अर्थात
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं।
प्रकृति और पुरुष दोनों को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। जिसका उदाहरण हमारे सनातनी धर्म में बहुताय जगहों पर वर्णित है।
अब एक नज़र वर्तमान परिदृश्य में आने वाले बदलावों को देखते हैं। बदलाव प्रकृति का नियम है। वह अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है। महिलाओं के समानता का अधिकार की बात हो रही है। यह हर युग में अपना रंग बदलता ही रहा है।
महिला समानाता दिवस यानी की वुमन इक्वीलिटी डे। यह 26 अगस्त को मनाया जाता है। महिला समानता के अधिकार की बात सबसे पहले बात करने के लिए अमेरिका की महिलाएं सामने आईं। महिलाओं को अमेरिका में वोट देने का भी अधिकार नही था। 50 सालों तक चली लड़ाई के बाद अमेरिका में महिलाओं को 26 अगस्त 1920 के दिन वोटिंग का अधिकार मिला।
लेकिन न्यूजीलैंड विश्व का पहला देश है, जिसने 1893 में महिला समानता की शुरुआत की। इसके पहले वहाँ महिलाओं को द्वितीय श्रेणी नागरिक का दर्जा प्राप्त था। महिलाओं को समानता का दर्जा दिलाने के लिए लगातार संघर्ष करने वाली एक महिला वकील बेल्ला अब्ज़ुग के प्रयास से 1971 से 26 अगस्त को ‘महिला समानता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। जिसके बाद इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मनाने लगे।
हमारे भारत में आज़ादी के बाद से ही महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्राप्त है और इसके साथ ही पंचायतों तथा नगर निकायों में चुनाव लड़ने का क़ानूनी अधिकार 73वे संविधान संशोधन के माध्यम से स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के प्रयास से मिला। इसी का परिणाम है कि आज भारत की पंचायतों में महिलाओं की 50 प्रतिशत से अधिक भागीदारी है।
कुछ प्रश्न फिर मेरे मानसपटल पर उभरने लगता है तो मैं अपने संविधान और समाज से पूछ लेती हूँ कि बताओ तो क्या सच में महिलाओं को समानता का अधिकार मिला हुआ है? क्या महिलाओं को पुरुषों के बराबर वह सारे अधिकार प्राप्त है ?
संविधान से जवाब मिलता है… हाँ कानून की नजर में तो महिला और पुरुष को सम अधिकार (बराबर का अधिकार) मिला हुआ है।
समाज से जवाब मिलता है… लेकिन समाज अभी भी महिलाओं के विषयों में दोयम दर्जे की मानसिकता रखता है। परुषसत्ता हावी है। आज भी जमीनीस्तर पर महिलाओं को पुरूषों के बराबर का अधिकार नहीं है। फिर मैं अपने आस-पास देखती हूँ, तो महसूस करती हूंँ, कि समाज की बात बिल्कुल सही है। समाज की बात में सच्चाई तो है। नकारा नहीं जा सकता है इसे।
आज़ादी के ७५ वर्ष बाद भी महिलाओं की स्थिति गौर करने लायक है। आए दिन छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी घटनाएँ आम हो चली है। इसके अलावा घरों के अंदर महिलाऐं चाहे मानसिक हो या शारीरिक प्रताड़ित होती ही रहती हैं।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि भारत में कई महिलाओं ने अनेक क्षेत्रों में अपना परचम लहराया है। श्रीमती इंदिरा गांधी, श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल, ममता बनर्जी,जय ललिता, मायावती,सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज,मीरा कुमार, इंदिरा नूई, चंदा कोचर, जैसी महिलाओं ने उच्चतम पद पर आसीन होकर अपना लोहा मनवाया है।
अब देखें तो जन साधारण में कितना बदलाव आया है! क्या महिलाओं का महिलाओं को लेकर सोच में परिवर्तन हुआ है ? जवाब मुश्किल नहीं है। क्योंकि आज भी माएं अपनी बच्चियों के सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। बेशक हमारे ही देश में अनेक वीरांगनाओं ने जन्म लिया है। किरण बेदी ज्वलंत उदाहरण है। जिन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु उदाहरण प्रस्तुत किया है। लेकिन यह भी सच है कि कुछ महिलाओं की उपलब्धियों के आधार पर यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि समाज की सभी महिलाओं को समानता का अधिकार प्राप्त है और महिलाएं सशक्त हैं।
अभी भी महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बराबर नहीं है। चाहे वह साक्षरता दर की बात हो या फिर रोजगार की,
दोयम दर्जे की स्थिति अब भी बनी हुई है। दफ़्तरों में कामकाजी महिलाओं के साथ भेदभाव की स्थिति बनी ही हुई है।
महिला सशक्तिकरण के पटल पर चलें। एक नज़र इसके भी इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र में देखें। क्या इतिहास में रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई जैसी सशक्त महिला से हमें प्रेरणा नहीं लेनी चाहिए। अपने अधिकारों को पाने के लिए कुछ जिम्मेदारियांँ हम महिलाओं को भी निभानी चाहिए। रिपोर्ट यह बताते हैं कि महिलाएं पुरूषों के मुकाबले अधिक सक्षम हैं।
नारी सशक्तीकरण की दिशा में सरकार ने कितने ही योजनाएं चलाई है। अब जिम्मेदारी हम महिलाओं की है कि वहाँ तक हम पहुंचे। लेकिन असल में सशक्तिकरण तब आएगी जब हम महिलाओं के संकल्प में परिवर्तन आयेगा।
जब महिलाएं अपने हक की बात खुद करेंगीं। लड़कियां सिर्फ विवाह करने के लिए नहीं पढ़ें बल्कि अपने पैरों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर एवं स्वावलंबी बनने के लिए पढ़ें।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दौर में भ्रूण हत्या और महिलाओं को बोझ समझा जाने की कवायद बनी हुई है।
महिलाओं को इस घेरे से खुद को निकालने की जरूरत है।

-अपर्णा विश्वनाथ

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