ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमनतुझपे दिल क़ुरबान•••

धृतराष्ट्र के ससुराल के हालात बद्तर हो ही गए।  हस्तिनापुर के अफगान बस्ती और लाजपत नगर में अफगान शरणार्थियों के आँखों में छुपे और कभी छलकते नीर बयां करते हैं दस्तान-ए-आलम-ए-फुर्कत।
मानो पूछते हो… कब तक ? आखिर कब तक बने रहेंगे हम शरणार्थी ? क्या कभी हम जा पाएंगे अपने गाँव ? सबकुछ तमाशा सा लगने लगा है!
लग रहा #Airlift सिनेमा चल रहा है।
मन थोड़ा विकल हो गया तो हस्तिनापुर में बैठी दीदी को कॉल लगा लेती हूँ।
क्यों ?  हस्तिनापुर खामोश चुपचाप तमाशा देख रहा है।
हम्म्… क्या ही कह सकते हैं।
काबूल से हमारे आत्मीय संबंध रहे हैं। मैं और दीदी इसी बारे में बातें करते करते अपने बीते हुए बचपन में पहुंच जाते हैं।
याद आ जाता है #काबुलीवाला…
#रविन्द्र_नाथ_टैगोर की लिखी यह लघुकथा शायद आज तक भी हिन्दी और बांग्ला भाषियों के मानसपटल से नहीं उतरी होगी।
#मिनी बड़ी हो गई है।
लेकिन क्या #रहमत अपने देश काबुल लौटा ??
और भी बहुत सारे प्रश्न हिलौरें मारने लगते हैं।
जाने कितने ही ऐसे मिनी काबुली वाला के हाथों से सुखे मेवे अपने बचपन में खाए होंगे।
मन फिर उन गलियारों में भटकने लगता है। बात उन दिनों की अच्छी तरह से याद है। मैं और दीदी बहुत बहुत छोटे थे। ऊंचा कद-काठी, दाडी, लाल गोरा रंग, ढीला-ढाला पायजामा-कुर्ता, जैकेट, पैरों में जूता, सर पर साफा और कंधे पर झोला लिए कुछ लोग कभी-कभार आया करते थे। हमारे आँखों में डर देख बाबा (पिताजी) कहते न न डरो मत वो लोग सीधे-सादे, अच्छे लोग हैं। काबुल से हैं अफगानिस्तानी लोग हैं।
अपनी अलग जुबान और अलग दिखने के कारण लोगों में खासकर बच्चों में कौतूहल और उत्सुकता का कारण बने रहते थें। याद है हम दो बहनें भी माँ से कहते … तुम भी कुछ खरीदो ना माँ … देखो तो उसके झोले में क्या-क्या है।
माँ को अच्छे हिंग (Asafoetida)का काफी पागलपन रहा है। अब भी है। इसके बिना छौंक (tempering) अधूरा सा लगता है।
माँ को इसकी आदत उनके पिताश्री (मेरे नानश्री) से आई।
नानाजी अपने जमाने में हिंग बाय पोस्ट लुधियाना के भल्ला ब्रदर्स से मंगाते थे। जिस दिन हिंग आती थी पूरे गाँव की चिट्ठी पत्री महक जाती थी।
हाँ तो इस चक्कर में माँ उन काबुली वालों से झिझकते हुए पूछ लेती। हिंग अच्छी वाली है ?
बोत आच्छा वाला हिंग है एक बार ले के देखो तो। बार बार फिर तुमलोग माँगेगा।
चिपचिपाती कच्ची हींग माँ सुंघती। और मन ही मन शुद्धता को लेकर खुश हो जाती।
हर काबुलीवाले में रहमत की छवि ढूंढती।
आज भी आँखें नम हो जाती है रहमत और मिनी को याद करते हुए।
अब अफगान से मेवे और हिंग नहीं आते माँ। अब तो यहां से सफेद पाउडर आते हैं। लोगों को तबाह करने।
जाने कब मेवे के झोले उठाने वाले रहमत ऐके-47 उठाने लगें।
हमारी बातें जब हमारी जुली दीदी सुनती है तो उनका भी मन भर आता है और काबुलीवाला सिनेमा का गाना मन ही मन गुनगुना उठती है, जिसे मन्ना डे ने गाया और बलराज साहनी पर फिल्माया गया था :
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन
तुझपे दिल क़ुरबान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू
तू ही मेरी जान…
कहती हैं…अब तो यही प्रार्थना है कि सभी अपने कौम में महफूज़ लौटें और अमन चैन से बसर करें।
खैर, क्या मुमकिन है… ??

-अपर्णा विश्वनाथ

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