पुस्तकालय और किताबें

*पुस्तकालय और किताबें*
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आज जिस तेजी से नैतिक मूल्यों का ह्रास और पतन हो रहा है कहीं न कहीं इसके भागीदार हम सभी हैं। बच्चें सामाजिकता से दूर चुपचाप मोबाइल, लेपटॉप और अन्य गेजेट्स में मशगूल  समय का अधिकांश हिस्सा इनमें व्यतीत करने के आदी हो चुके हैं। पालक भी समय के हाथों मजबूर कठपुतली बनकर रह गए हैं।
ई-शिक्षा, ई-मेल, ई-पेपर, ई-कॉमर्स, ई-क्लासेस, और क्या नहीं। यह भी क्षसच है कि टेक्नोलॉजी का हमारे जीवन में जीने की कला और जीवन स्तर में खासा प्रभाव पड़ रहा है। शिक्षा जगत भी इस प्रगतिशीलता से अछूता नहीं है।
शिक्षा ही क्यों बाकी दूसरे क्षेत्र भी अछूते नहीं हैं।
सकारात्मक पहलुओं के साथ नकारात्मक पहलुओं की भी बाढ़ सी है।
ऑनलाईन क्लासेस – शिक्षकों-छात्रों के बीच कमजोर होते संबंध।
पोस्टमैन और चिठ्ठी-पत्रियों की जगह ई-मेल, मोबाईल ने ले ली का प्रभाव हमारे अपने रिश्तेदारों से कमजोर होते रिश्ते-नाते पर भी पड़ा ही है।
ऑनलाइन शॉपिंग – घर बैठे खरीदारी की सुविधा से सुविधा तो बढ़ गई लेकिन दुकानदारों से मेल-मिलाप और आत्मीयता खत्म होती चली गई।
बच्चों के हाथों में मोबाइल तो जैसे कर लो दुनिया मुट्ठी में । सारे गुरु और ज्ञान एक छूअन एक बटन पर। शिक्षकों और छात्रों के बीच दो हाथ की दूरी का खत्म होता फासला। असर बच्चों में शारीरिक, मानसिक,आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों का ह्रास और पतन।  परेशानियों का सबब्  समय और टेक्नोलॉजी कहीं न कहीं है ही। प्रश्न है कहाँ तक हम बच सकते हैं ?
तो चलिए कम-से-कम एक कोशिश जो हमारे हाथ में है वह तो कर ही सकते हैं। वो यह कि अपने बच्चों पर थोड़ा सा ध्यान —
अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हम बच्चों को पार्क और ज़िम तो भेज देते हैं। क्या कभी मानसिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सोचते हैं ? नहीं ना !
कितने पालक अपने बच्चों के पुस्तकालय जाने के लिए कहते या प्रेरित करते हैं ? एक बार सोचिए!
पुस्तकालय (लायब्रेरी) में किताबें ढूंढना भी अपने आप में एक कला है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। लाखों लाख किताबें। एक अलग ही आनंद और अलग ही दुनिया में प्रवेश। आप कितना भी मोबाइल लेपटॉप में बेशक पढ़ लें मगर जो सूकुन और संतृप्ति किताबों को छूने से मिलती है वह और दूसरे ई- किताबों में नहीं।
एक तरह से कह लिजिए विद्यालय जाके शिक्षकों के समीप रहकर पढ़ाई करने और ऑनलाइन पढ़ाई करने में जो अंतर है वही अंतर है किताबें हाथ में उठाए पेज पलट के पढ़ने और मोबाइल, लेपटॉप में पढ़ने में हैं।
कागज़ की एक आवाज और खुशबू होती है जिसे हम सुनते और महसूस भी करते हैं। पेज पलटने की प्रक्रिया में हाथों का व्यायाम भी हो जाता है। फिर पेंसिल से हम किताबों में अंडरलाइन भी तो करते हैं। बेशक यह सुविधाएं टेक्नोलॉजी और यंत्र में होंगें लेकिन कहाँ मुमकिन वह एहसास, अपनापन और अनुभव इन ई- किताबों में मिलें।
किताबें न तो आपके आँखों को नुकसान पहुंचाते और न ही कोई नुक़सान दायक विकिरण पैदा करते हैं जैसे कि दूसरे गेजेट्स और उपकरणों करते हैं।
आजकल बच्चों के साथ-साथ पालक भी पढ़ाई लिखाई के लिए विभिन्न गेजेट्सों पर निर्भर होते जा रहे हैं। भले ही शरीर पर इसके लाख विपरीत प्रभाव पड़ रहें हो।
हाँ किताबें बेशक बच्चों द्वारा ख़रीदीं जा रही हैं। लेकिन वह नई की नई पड़ी रहती हैं। क्योंकि आज बच्चें किताबें खोलते ही कितने हैं ? पढ़ने की आदत खोते जो जा रहें हैं। तो यह जिम्मेदारी विद्यालय, शिक्षक और पालकों की भी हैं कि अपने बच्चों को यथार्थ भौतिक किताबें पढ़ने की अच्छी आदत डालें।
अपने पास के लायब्रेरी में उन्हें जाने के लिए उत्साहित करें।
याद रखिए आप लायब्रेरी में जब जाते हैं ना तब ज्ञान की दुनिया में प्रवेश करने के साथ ही एक ऐसे  नियंत्रित वातावरण में समय बिताते हैं जहाँ दिमाग के साथ स्वास्थ्य पर भी साकारात्मक ऊर्जा और सोच उत्पन्न होती है और एक बात कि हम जिस पुस्तक को खोलते हैं बस उसी से संबंधित विषय पढ़ते हैं,दूसरी तरफ भटकते नहीं। मोबाइल, लेपटॉप में हम जाते तो हैं एक ओर हैं मगर निकल पड़ते दूसरी ओर। ध्यान भटकाते अनेकानेक रास्तें अपने आप खुलते ही जाते हैं। लेकिन पुस्तकालय के नियंत्रित वातावरण में बच्चें इन कुप्रभावों से दूर सुरक्षित फलते-फूलते हैं।
तभी तो पुस्तकालय को मंदिर कहते हैं।

– अपर्णा विश्वनाथ

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