मच्छरदानी

अब थकावट सी लगने लगी थी। अचानक सर उठा तो ध्यान टीवी स्क्रीन पर पड़ा। बापरे यह क्या रात के पौने बारह। हे भगवान! कब इतनी रात हो गई लिखते पता ही नहीं चला।
लिखते लिखते समय का पता ही नहीं चलता। बस जुनून रहता है कि लेखनी कम-से-कम एक मोड़ तक पहुंच जाए। 
आजतक न्यूज चैनल अपना योगदान दे रहा था। घर के सारे लाइट्स, पंखे ऑन है।
फटाफट अपनी लेखनी को विराम देते हुए उठी। इधर उधर नजर दौड़ाई तो देखी मुझे छोड़ बाकी सभी मेरी राह देखते देखते सो चुके थे। लेकिन ऐ क्या किसी ने मच्छरदानी क्यों नहीं बाँधी ? इसके बिना नींद नहीं आती आदत जो हो गई है। मैं न बाँधूं तो ऐसे ही सब सो जायेंगे। देखना सब उठ जाएंगे थोड़ी ही देर में।
गुस्से में मैं बड़-बड़ करने लगी। अचानक बड़-बड़ बंद करनी पड़ी मुझे। अरे यहीं तो रखती हूं मच्छरदानी कहाँ गई ? और दस मिनट बर्बाद। बहुत इधर उधर नजर दौड़ाई। याद आया अरे वो तो मैंने दोपहर में सर्फ में भिगोए थे धुलने के लिए और
और लो भूल गई। अब ??  बारह बज रहे थे। हे भगवान कैसे करूं! गलती मेरी थी तो उपाय मुझे ही ढूंढना था वो भी किसी के जागने से पहले। मच्छरदानी को फटाफट पानी से खंगाली बिना शोरगुल किए धीमे-धीमे। अब सुखाने की पारी। बाहर झमाझम जोरदार बारिश। ओफ्फ… कैसे करूं। इसी उहापोह में कि अगर माँ जागी तो हो गई मेरी। बैंड बाजा डालेगी कि इतनी भी क्या भुल्लकडी। बात भी सही ही है। भई मगर अब क्या करें ? प्रश्न अपनी जगह अडिग। तभी सालों से बंद पड़े वाशिंग मशीन को देख एक मासूम सी उम्मीद जागी। अब तेरा ही भरोसा अब तू ही सहारा। आज चल जा। मच्छरदानी को ली स्पीनर में डाली प्लग लगाई, और स्वीच ऑन। घररररर… कमाल चमत्कार कुछ भी कह लो। चल पड़ी। मुझे खुशी का ठिकाना से ज्यादा कौन सा ठिकाना हुआ कहना मुश्किल है। क्या बात मिनटों में मच्छरदानी ऐसे सूखी कि कभी गीली ही ना हुई हो। बस क्या था फटाफट मच्छरदानी बांध दिया मैंने। थोड़ी खटपट हुई तो सबको लगा मच्छर भाई परेशान कर रहे हैं। मैं चुपचाप भगवान को मशीन को और टेक्नोलॉजी को धन्यवाद दे रही थी। आज अचानक कोने में सालों से पड़ी बेजा़र मशीन ने ऐसे साथ निभाया गोया किसी पुराने दोस्त ने, जो सालों न मिलने के बावजूद भी समय पड़ने पर आपके मुश्किल समय में अपनी दोस्ती निभा जाते और जताते कभी नहीं।

-अपर्णा विश्वनाथ

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