उम्मीदों की रौशनदान


क्या कोरोना महामारी किसी एक खास देश से जुड़ी समस्या है ? कोई भी बोल पड़ेगा नहीं! (“तथाकथित”) कोरोना तो पूरे विश्व का मामला है । कोरोना वायरस की त्रासदीपूर्ण और भयावह स्थिति से हर जगह हाहाकार मचा हुआ है। अस्पताल, आॅक्सीजन, दवाईयां, इंजेकशन, बेड और साँस के लिए जूझते हुए हताश लोग। फिर जगजाहिर प्रतिदिन मौत के आँकडे और वह सब कुछ जिसका पत्ता पत्ता बूटा बूटा और आप खुद ही हस्ताक्षर हैं।
सरकारें अपने अपने देशवासियों के लिए वैक्सीन और अमूमन हर उन चीजों के इंतजाम में भिड़ी हुईं हैं जिससे मौत का तांडव रुक जाए। हमारा देश भी। ऐसे में वैक्सिनेशन ही एकमात्र कारगर उपाय कोरोना महामारी का।
वैक्सीन की माँग (जरूरत) ज्यादा और आपूर्ति कम की स्थिति बहुत सारे देशों में है यह भी पानी की तरह साफ है। कम समय में इतने अधिक मात्रा में उत्पादन के साथ साथ, सरकारी नियमों, नितियों तथा कच्चे माल की समस्याओं से कंपनियों को दो चार भी होना पड़ रहा है।
इन सब बातों का, समस्याओं का वायरस को तो खैर कोई लेना-देना नहीं। वह तो अपनी जगह मानो अडिग प्राण लेने में तत्पर।
इन सब के बीच यह भी आश्चर्य की बात है कि विश्व के बहुत सारे देशों के पास इतनी मात्रा में वैक्सीन है कि दो से तीन बार अपने देशवासियों का वैक्सिनेशन कर सकते हैं। दूसरी तरफ हमारे जैसे ऐसे अनेकों ऐसे देश हैं जो एक बार की वैक्सिंनेशन की कमी से जूझ रहे हैं। अब दूसरा पहलू आपदा में अवसर तलाशते कुछ देश और बड़ी बड़ी कंपनियाँ बाज़ नहीं आ रही है। हमारे यहाँ तो हालात ऐसे हैं कि क्या कहा जाए। कालाबाजारी, नकली दवाएं, नकली इंजेक्शन, यहाँ तक की नकली आॉक्सीजन। हमारे यहाँ के पैसे के भूखे व्यापारी तो माहिर हैं कालाबाजारी के लिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अगर देखा जाए तो मामला यहाँ
सोने पे सुहागा जैसा एक देश दूसरे देशों को ना तो वैक्सीन का फार्मूला दे रहें ना ही वैक्सीन।
अब अगर बात करें दूसरे उन छोटे और गरीब देशों की तो मंज़र सोचते हुए चिंता होती है। चिंता का तो विषय है ही।
आपको क्या लगता है कि यह समस्या सिर्फ अपने अपने देशों की है ? क्या लगता है कि हम अपने देशवासियों का वैक्सीनेशन कर देंगे तो वायरस से निजात पा लेंगे ?मुमकिन है यह?
हाँ है कब जब आप दूसरे देशों से व्यावहारिक और व्यापारिक रिश्ते नाते तोड़ लें। जो किसी भी देश के लिए आज के वैश्वीकरण, राजनीतीकरण और बाजारीकरण के युग में शायद ही मुमकिन है।
ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि अगर विश्व में कोई भी देश वैक्सीनेशन से चूक रहा है तो खतरा सबके लिए। तब बात यह है कि आप मतलबी बनकर शान्ति पूर्वक नहीं जी सकते। सवाल फिर से वहीं की वहीं आखिर इन सबका समाधान क्या और कैसे ?
जब महामारी एक अकेले देश की ना होकर वैश्विक महामारी की हो तो मुद्दा अंतरर्राष्ट्रीय हो जाता है। सोच के देखिए साउथ अफ्रीका में कितने ही ऐसे देश हैं जहाँ खाने के लाले पड़े हैं वैसे में दवाइयाँ वैक्सीनेशन तो कोसों दूर की बात है।
फिर से सोचने वाली बात है कि अगर वैसे देशों में महामारी का प्रकोप और उसकी रोकथाम कौन करे कौन संज्ञान लें। या फिर उन्हें मरता पूरा विश्व देखता रहे।
क्या ऐसे हालात में यूं.एन., यूं.एन.ओ.और डब्ल्यू. एच.ओ. इसका संज्ञान नहीं लेना चाहिए ? इस नाज़ुक परिस्थिति में ठोस कदम और ठोस निर्णय लें जिससे पूरे विश्व को महामारी की चपेट से बचाया जा सके। नर्मी से बात नहीं बनती है तो सख्त कदम उठाए जाएं।
हे विकसित देशों ! वैक्सीन की उम्र मात्र छः महीने की है और बहुत सारे देश ऐसे हैं जिनके पास सरप्लस में हैं। ऐसे में सभी देशों की आशाएं बंध जाती हैं कि यह बड़े दिल से सामने आएं त्रासदी को रोकने में वैश्विक योगदान कर आपसी सौहार्द की भावनाओं को आहत ना पहुंचने दें और मानवता की रक्षा करें। घुप अंधेरे में एक जुगनू ही काफी है। उम्मीद ही तो है जो हम कर या दिखा सकते हैं उम्मीदों की रौशनदान खोलो। वो एक जुगनू बन के उजला इतिहास तो रच सकते हैं।

-अपर्णा विश्वनाथ

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