लो इक्कीसवीं सदी को इक्कीसवां साल लग रहा है(*#भस्म_काली_रात_हो_अब_रौशनी_की_बात_हो*)*****************************************


उसका पहला रूख़ पूरे विश्व में सन्नाटा, हर जगह ताला, बंदिशें, पाबंदियां, इंसान अपने ही घरों में कैद, और वह इन सबका चश्मदीद। दूसरा रूख़ यह भी कि उसने जंगल से पहाड़ के दर्शन, दूरदर्शन में रामायण के दर्शन करवा दिया, बहुत सारे बदलाव का साक्षी, वर्तमान का प्रत्यक्षदर्शी, आने वाले समय के लिए इतिहास दर्ज कराता, शेयर मार्केट और जीडीपी को रसातल में पहुंचाता। जी हाँ सही कहा यह वही साल 2020 जिसने दुनिया को बहुत कुछ पहली बार दिया जो साल 2020 के पहले कभी भी नहीं हुआ था।
क्या मज़ाक में भी कोई कह सकता कि मुझे नहीं मालूम या मुझे याद नहीं साल 2020 ? सतर्क, एहतियात, मास्क, दो गज दूरी की दुहाई देता यह साल कितनों को अपने लपेटे में ले लिया कोई गिनती नहीं। क्या आप साक्षी नहीं ? आप सभी तो हस्ताक्षर हैं !

बगैर लाग-लपेट अगर कहा जाए कि साल 2020 कोरोनो को समर्पित रहा तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अच्छा बुरा सबसे बावस्ता करवा दिया साल 2020 ने। उम्र का कोई तकाज़ा नहीं, बच्चे, बड़े, बुजुर्ग हर कोई गवाह रहें इसके।
फिर ज़ेहन में एक खयाल बाज़ दफा दस्तक देता ही रहा कि इसे क्या कहें किस्मत, तकदीर या ऊपर वाले की इच्छा ? मौत ने जो बेलगाम बेहिसाब कहर बरपाया है देखकर आनंद पिक्चर की वो डायलॉग कानों में फिर से मानो दोहरा गई…

बाबूमोशाय !

“जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में हैं जहाँपनाह, जिसे न आप बदल सकते हैं, न मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है। कब, कौन, कैसे उठेगा, यह कोई नहीं जानता…”
कितना सच साबित हुआ ना ? सब इसके गवाह रहें हैं, हालात का शिकार हर कोई हुआ, मजबूर हर इंसान हुआ।
महामारी का शिकार वैश्विक पटल पर सभी हुए खासकर मजदूर वर्ग का एक विस्तृत हिस्सा बलि चढ़ा इस महामारी का जिसका जिक्र करना भी मौत के सामने से गुजरने जैसा है। कोई भरपाई नहीं हो सकती यह वह क्षति थी, मानवीय हानि बेहिसाब हुई। हाँ तब दुःख पहाड़ जैसे ही लगा। साल 2020 ने लोगों के गुमान को तो जैसे तहस नहस ही कर दिया। लोगों को अर्श से फर्श पर लिटा दिया, मानो सबक सिखाने धरती पर अवतरित हुआ।
अब अलग पहलू देखें तो इन सबके बीच हाँ सकारात्मक प्रभाव यह रहा कि मजबूर हालात में मनोबल भी मज़बूत हुआ, लोगों ने आत्मनिर्भरता हासिल कर ली। लोगों के जीवन शैली में बहुत बदलाव आया।
मैं तो हमेशा से ईश्वर को परम मानती आई हूँ, जब एक पत्ता भी नहीं हिलता परमेश्वर के आज्ञा के बिना तो फिर हमारी क्या बिसात कि उनकी अनुमति के बिना कोई प्राणवायु लेने की जुर्रत कर सकें। इसलिए अपनी किस्मत को लेकर या अन्य किसी भी तरह के परिस्थितियों में कभी भी उस परमेश्वर से कोई शिकवा शिकायत दर्ज नहीं की।
आज हम जो कुछ भी है उसकी अनुमति से ही है। सबकुछ लिखा जा चुका है, सबकुछ तय है…जन्म से लेकर मृत्यु तक, उतराव चढ़ाव, साँसों की गिनती,सुख दुःख,…किसी के जिंदगी का हिस्सा बनना या ना बनना आपका हर पड़ाव पहले से ही लिखा जा चुका है।आज मनुष्य का ईश्वर की सृष्टि में निमित्त मात्र होने का एहसास कराना भी कदाचित उस परमेश्वर की रचना का एक अंश है।विकसित और विकासशील कहे जाने वाले दंभ भरने वाले सब धरे के धरे रह गऐ इस 2020 में।
कभी सोचूं तो लगता है इन सबके पीछे भी कोई ना कोई तो सबब् रहा होगा। वो क्या है ?
शायद यह तब हुआ जब मनुष्यों ने ईश्वर की अवहेलना करना प्रारंभ किया। मानवीय मूल्यों की अवहेलना होने लगीं, मनुष्य मनुष्य का शोषण करने लगा। हाँ शायद हम इंसानों में दया, प्रेम, एहसास, मनोबल, विश्वास, और ना जाने ऐसे कितने ही विशेषणों का अवरोहण होने लगा रिश्तों में कड़वाहट बढ़ने लगी और यही बात ऊपरवाले को खटकने लगी होगी। लोगों के मुखौटे के पीछे का असली चेहरा सामने लाना भी साल 2020 का एक एजेंडा सा लगा। लगा कहीं-न-कहीं यह हम सबके कर्मों का ही प्रसाद है।
ऐसे ना जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न उठते ज़ेहन में !
लेकिन सकारात्मकता यह रही कि हाहाकार की परिस्थितियों में भी सभी यंत्रवत परिस्थितियों का सामना सामान्य होकर करते रहे हैं।

*ऐ जिंदगी गले लगा ले हमने भी तेरे हर इक ग़म को गले से लगाया है*। है ना ?
क्योंकि अब आपकी आज्ञा कहने, नतमस्तक होने के सिवा मनुवाद के पास कुछ नहीं बचता कहाँ है। इतना होने पर भी यही कहूंगी कि ऊपरवाला पालनहारा हम मनुष्यों जैसा निर्दयी तो नहीं है। उपर वाले के यहाँ देर है अंधेर नहीं। क्योंकि परिस्थितियों का सामना करने के लिए रास्ता और हौंसला भी उसने दिया। इस महामारी के दुखदाई घड़ी में सुखद पहलू यह रही कि साल 2020 ने हम सभी को परिस्थितियों से जूझना और आत्मनिर्भर होना सीखा दिया है। सभी हादसों को भूल हम आगे बढ़े।
मुझे और शायद हम सभी को भी साल 2020 के परिस्थितियों को स्वीकार करने के सिवाय कोई मार्ग भी तो नहीं था। कोई भी क्षण अपने नियंत्रण में नहीं यह प्रमाणसिद्ध तो हो गया और अटूट भी जब एक दिन मुझे खबर मिली कि मेरी पड़ोसन के पिताश्री ने अंतिम सांँस ली। दूसरे शहर में होने की वज़ह से वे अंत्येष्टि के लिए गंतव्य तक पहुंचने में असमर्थ रही। विडियो कान्फ्रेसिंग के जरिए अंतिम बार मृत आत्मा के दर्शन वह और उसके बाकी परिवार वाले भी बगैर कोई शिकायत कर लिए। उस दिन दिखा रूपए पैसे धरे के धरे रह गए हैं।
करते भी क्या ? इस महादु:ख की कठिन परिस्थितियों में अपने आप को नियंत्रित करने के सिवा कोई चारा नहीं था किसी के पास। बिल्कुल साकारात्मकता थी सबकी सोच में।
फिर लगा कि क्या यही विकास है ? ऐसे कितने ही विचारणीय तथ्य ज़ेहन में घूमें।
ना जाने ऐसे कितने बच्चें अपने पिता के अंतिम बार दर्शन करने से रह गए। रिश्ते-नाते सभी मानो ताक पर रख दिए गए।

साल 2020 ने महसूस करवा दिया और यह बात सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया कि एक अदृश्य शक्ति ने सारे विज्ञान को, तरक्कियों को दरकिनार कर आगे बढ़ गया है। मनुष्यों को जैसे लानत भेज दिया हो।
एक लंबी सांस लेने के सिवाय कोई जवाब ना था मेरे पास।
दंभ ही तो था मनुष्य जाति को जो अब टूट चुका है। क्या मनुष्य अपने विकसित होने पर गर्व करें या विकसित होने के लिए जिन प्रतिबंधित मार्गों को चुन कर विकसित हुए उस पर पश्चाताप करें ?
ना जाने ऐसी कितने ही ऐसे परिवार, कितने ही मजदूर वर्ग, कितने ही आम आदमी और अनगिनत आंसूओं का सैलाब इस साल 2020 कोरोना का हिस्सा और बनेंगें।
फ़िल्म जगत, खेल जगत, साहित्य जगत, राजनीतिक जगत कोई अछूता नहीं रह गया। सभी जगह कोरोना अपना आवरण बिछाता सांँसों को अपने शिकंजे में करता जिंदगी की लडी़ को तोड़ने में कामयाबी दर्ज करता हुआ थमने का नाम नहीं ले रहा।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।
बस शांति पाठ कर सकते हैं।
इन सबसे परे अगर एक नज़र बच्चों पर भी फिराई जाए तो दिखेगा कि इस बार उनके लिए यह साल कितना कठिन रहा क्योंकि इस बार उनके लिए बहुत कुछ नहीं है। इनकी मन:स्थिती को पढ़ना भी गैरजरूरी समझा गया अनदेखा भी किया गया। विद्यालय और बच्चों का रिश्ता वो होता है जो इंसानों का प्राणवायु से। कोरोना के ना तो आगाज़ का अंदाजा था ना ही अंजाम का पता है। बिना ओर-छोर के लगभग दस महीने बीत गए अपने अपने स्कूलों का चेहरा देखे। अब तो धीरे धीरे आदत सी हो गई है, बच्चें भी स्कूल के बिना अपनी दिनचर्या को मैनेज कर लें रहे हैं। लेकिन कहीं न कहीं इसकी कमी तो खल ही रही है। क्यों न खले ! किसने सोचा था कि इस बार यह सब नहीं होने वाला है।
सच बच्चों की मन:दशा तो वाकई रूलाने वाली रही। सज़ा ही तो है यह साल 2020 बच्चों के लिए, मज़ा तो इन्हें हर हाल में हर माहौल में अपने स्कूल में ही आता है। स्कूल तो बच्चों की ऑक्सी जोन है। इसके बिना घुटन तो महसूस होगी ही।
मगर किया भी क्या जा सकता है ? उम्मीद पे ही दुनिया कायम है। हाँ अपनी नैतिक जिम्मेदारियों का वहन करते हुए हम सब वैक्सिंग का इंतजार करेंगे।
और इस उम्मीद के साथ कि इक्कीसवीं शताब्दी का इक्कीसवां वसंत अपने ब्यार के साथ,
नई किरणें, नई उम्मीदें, नए रास्ते, बुलंद हौंसले, बेहतर स्वास्थय, बेहतर विकल्प, बेहतर दृष्टिकोण, बेहतर रोजगार, बेहतर सोच, बेहतर वातावरण, बेहतर स्वास्थय व्यवस्था, बेहतर शिक्षा, बेहिसाब खुशियाँ, बेहिसाब मुस्कुराहट अपने साथ लाएगा और सबके उदास चेहरे फिर से मुस्कुराएंगे- खिलखिलाएं !

तो *#अलविदा_2020*!!

*भस्म काली रात हो, अब रौशनी की बात हो* इतनी सी
मंगलकामनाओं के साथ सभी को नूतन वर्ष की अशेष शुभकामनाएं।

-अपर्णा विश्वनाथ🍁

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