#सुनो_पीताम्बरा !**************


पिन सी चुभोती शीत ऋतु में हवा भी मानो शरारती हो जाती है।
हिमगिरि से उतरती ठंडी-ठंडी सनसनाती हवा दरख़्तों को वादियों को पीछे छोड़ते जब हमारी सांसों और त्वचा से टकरा खेलने लगती है।
और तब करिश्माई आलस, भोर के साथ हमें भी अपने शिकंजे में जकड़ लेता है और हम सब कभी ना कभी उस आलस जी के शिकार होते हुए नर्म,गर्म, मुलायम बिस्तर के बाहूपाश से बाहर निकलना नहीं चाहते।
फिर इंतजार रहता उस चिरन्तन पीताम्बर का उसकी उष्मा का। पीताम्बर मानो गर्व और गौरव सा महसूस करता और कहता देखो ना कैसे इस शीत की अलसाई सुबह में आसमानी छत के नीचे घर आंगन और छत में लोग मुझसे मिलने, मेरे कोमल उष्मा को जज़्ब करने के लिए आँखें मूंदे कोई औंधे पड़े कोई पेट के बल लेटे अपनी शुष्क त्वचा और देह मुझे समर्पित कर देने को आतुर हैं कितना सुन्दर है ना यह समर्पण।
प्रचंड अंगार वाला वह पीताम्बर इन दिनों सुंदर नर्म धवल में तब्दील इतराते बादलों के ओट से जब निकलता तो सबको अपनी ओर आकर्षित करता। जिसके आने और स्पर्श का इंतजार हर किसी को रहता।
सोचती हूंँ शीत ऋतु का आगमन पृथ्वी पर होता रहना शायद यह संकेत बताने का है कि उस पीताम्बर के उष्मा का हमारे जीवन में कितना महत्व है।
देखा जाए तो उष्मा शीत के विपरित है। लेकिन शीत पड़ गए रक्त में संचार उष्मा से ही है। शीत या ठंडा जहाँ मृत्यु या शोक है वहीं उष्मा या गर्म जीवन है।
हर कोई जीवन रूपी अग्नि को शीत ऋतु में मंत्र सा उच्चारण करता अपने में सोखता, आलिंगनबद्ध करता और गुनगुन धूप में गुनगुनाता उत्सव सा महसूस करता है।
धुंध में लिपटा सिकुड़ा दिन, सिकुड़े पेड़-पौधे, सिकुड़े जीव-जंतु, झील, नदी, तालाब सिकुड़ती त्वचा और कहीं सिकुड़ता मन भी फैलने और पिघलने के लिए उस रेशम से रेशमी मुलायम किरणों का इंतजार करते हैं जो किसी पर्व से कम कहाँ।
ग्रीष्म की चिलचिलाती धूप जहाँ देह को जलाती है वहीं शीत में यह धूप लिहाफ़ से कम नहीं जिसे हर उम्र के लोग ओढ़ने की चाहत में चारदीवारी से बाहर निकल आते हैं। भोर की पहली उष्मा को स्पर्श करने मात्र से ही मानो वसुंधरा खिलखिलाती हंसती, राग भैरवी गाती सदा सुहागिन सा महसूस करने लगती है।
पीताम्बर के स्पर्श से हरेक फूल सुर्ख रंगों से सराबोर अधिक जीवंत हो उठता है। पीताम्बर के स्वागत में हर डाल हर शाखा हर पत्ता, बल खाती बेलें, बूटा तीन ताल सोलह मात्राओं में मानो तत्कार करते हुए लगते हैं।
सुनो! थोड़ा उस प्रकृति के साथ, पास ठहरना!
हाँ .. उसे निहारना, महसूस करना, पढ़ना प्रकृति के कण कण में लिप्त उस खामोश वर्णमाला को और तुम भी प्रेम करना उस उष्मा से जो तुम्हारे अंदर रक्तवाहिनियों में प्रवाहित होती साँस रुपी जीवन को संगीतबद्ध गीत में परिवर्तित करने में सक्षम है। सुनना उस गीत को…
कि खुद से प्रेम करना भी तब तुम सीख ही जाओगे।
कि जीवन जो एक निरन्तर यात्रा है में मनुष्य अपने आप में लौटने लगता है जब वह खुद से प्रेम करने लगता है।
आज पीताम्बर कह रहा हो जैसे :
सुनो पीताम्बरा !
रचो एक गीत, लिखो एक कविता, एक मंत्र जो उष्मा दें, संचार दे टूटते सांसों को श्रृंखला दें।
कह रहा हो जैसे ओढ़ लो, समाहित कर लो, शोषित कर लो मुझे अपने अंदर, प्रेम कर लो खुद से, और…
बन जाओ पीताम्बरा…

-अपर्णा विश्वनाथ🍁

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