एक बेहिसाब कोशिश

बचपन में कई कोशिशें करती
रौशनदान से आती धूप के
टुकड़े को
नर्म हथेलियों में रखने
कभी मुट्ठी में भरने
कभी माचिस के डिब्बे में बंद
करने की

धूप का टुकड़ा कहीं
फुदक भाग ना जाए
देर तक मुट्ठी नहीं खोलती
जब मुट्ठी अकड़ जाती तो
खोलकर हथेलियों को तुरंत
अपने कपड़ों में पोंछ लेती
मन ही मन खुश
रौशनदान वाले धूप के टुकड़े से
मैं पूछती !
अब कहां भागोगे ?

वह जवाब नहीं देता
उसके साथ मैं खेलती
बातें करती जैसे
मेरी हर बात समझता हो

फिर एक वक्त में
उसके ना दिखने का रहस्य
नहीं जान पाती और
उदास हो जाती

उसका पश्चिम का रुख कर लेना
कोई रहस्य नहीं
यह संकेत है
दिन के विदा होने का
यह संकेत है शाम के आमद का
अरसों बाद यह समझ जाती हूं

फुर्सत के लम्हों में
शाम के उजाले में
एक बेहिसाब कोशिश
अपने हिस्से के धूप को समेटने की
चुपचाप हथेलियों को बिछा
नर्म उष्मा को छिपाने की
रौशनदान से झडती धूप से बातें करने की
एक बेहिसाब कोशिश अब भी करती हूं !

-अपर्णा विश्वनाथ 

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