#Durgapujo#Bongfriends #memories


अक्सर दूर से आती ऐसी खुशबू जिन्हें हमें फिज़ाओं में ढूंढना पड़े मुझे आकर्षित करती है। वो जिसे महसूस कर सारे दिन की थकान दूर हो जाती है। आज हल्की ठंड में पारिजात की खुशबू हवा में मानो घुल बिखर रही है। खुशबुओं से हमारी यादों का गहरा संबंध होता है।

आज फिर पारिजात देखते ही मन दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ पूजा के यादों के गलियारे में घूमने लगता है। छोटे छोटे सफेद फूल चटख नारंगी रंग के डंठल अक्सर जिसे देखकर मैं चुनने के लिए बैठ जाया करती थी। मुट्ठी भर फ़ूल चुन कर घर ले आती मां भगवान पर चढ़ा दिया करती। मां कहती रंग-बिरंगे फूल भगवान पर रेशम वस्त्र के समान लगते हैं। कहती शायद रेशमी कपड़ों को चटख रंग इन फूलों से ही मिलें हैं।

दुर्गा पूजा मतलब लगभग महीने भर की स्कूल की छुट्टियां तय। नए कपड़े तय। खाने को स्नैक्स आयटम डब्बों में भरेगा यह भी तय, नारायण भंडार का कलाकंद जो आज भी बाबा मेरे लिए लाते है वो भी तय । अलमारी में नए कपड़ों का होना भी तय।
बाबा सबके लिए चार- पांच जोड़े कपड़े (संचेती के यहां से ही ) खरीदते ही थे। बाबा की फेवरेट फेब्रिक हमेशा से काॅटन, काॅट्स ऊल रही साथ अगर चेक्स हो तो क्या बात और बाटा के कैनवस जूते इसके आगे बाबा को कुछ पसंद नहीं आता था। हमें भी वही आदत सी हो गई।

उन दिनों हम सभी दोस्त एक-दूसरे के यहां पूजा के नए कपड़े देखने के लिए पहुंच जाया करते थे। जाने क्या मजा था ? मैं हर दिन एक नए कपड़े पहन लेती। मां बोलती एक बचा लो संक्रांत में पहनने के लिए, पर मैं कब सुनने वाली। सब पहन लिया करती ।

अष्टमी को पुष्पांजलि देने मां के साथ जाते थे। पूजा पंडाल में धुना, ढा़की के माहौल में सभी एकबार प्रतिमा के सामने नतमस्तक हो जाते, महाअष्टमी प्रसाद खिचड़ी सब्जी दोना में मिलता खा लेते ।
सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी महत्वपूर्ण दिन भक्ति के लिए नहीं बल्कि नए कपड़े पहनने, गोलगप्पे ( पुचका), चाट खाने के लिए हुआ करता था। अब सोचूं तो सबकुछ जादू सा लगता है। पूजा पाॅकेट मनी बाबा अलग से देते। बाबा हमारी खुशी में ही अपनी खुशी ढूंढते। जो आज भी बदस्तूर बरकरार है।

समय बदला और सबकुछ बदला।
अब तो साड़ियों से भरी अलमारी है । लेकिन वो फ्राॅक्स नहीं।
चप्पल जूतों से भरा शू रैक है लेकिन वो कैनवस जूतों वाला कंफर्ट एहसास नहीं।
गोलगप्पे हैं लेकिन वो टेस्ट नहीं क्योंकि अब पाकेट मनी में वो बाबा वाला प्यार नहीं।
दुर्गा पूजा तो है लेकिन धुना की महक और ढा़की की डन डना डन की आवाज में वो उत्साह वाली बात नहीं।
दोस्त तो है लेकिन बचपन वाले मासूम दोस्तों वाली बात नहीं अब सभी प्रोफेशनल है ।
पारिजात है लेकिन अब मैं खुशबू नहीं ढूंढती। जिंदगी की आपाधापी में सब फी़का सा पड़ रहा मानो ।
अब बचपन वाले जादू भरे दिन वाली बात भी तो नहीं ।

-अपर्णा विश्वनाथ 🍁

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s