मिस्ड यू****

मिस्ड यू (एक संस्मरण)


कुछ मुलाकातें यादों का घरौंदा बन ज़हन में ठहर ही जातें हैं।

एक लंबे अंतराल में यादों में कुहास सा छा जाता है। कभी न कभी

फुर्सत के लम्हों में वह कुहासा अपने आप छंट भी जाता है।

अचानक आज वो कुहासा छंटता है, जब एक पुरानी डायरी मेरे हाथ लगती है।

काफी देर इधर-उधर चश्मा ढूंढती हूं। नहीं मिलती। ओह सर के ऊपर ही है। आदत जो है चश्मा को सर पर चढ़ा लेने की।

होंठों पर हल्की हंसी से गाल ऊपर और नयन छोटे हो जाते हैं।

मन में उथल पुथल मचा। फटाफट एक कप कॉफी बनाती हूं। कॉफी मग लिए चुपचाप ग्रीन कॉफी की अरोमा को सांसों में खींचते हुए सीढ़ियों पर बैठ जाती हूं।

अनायास मन वापस उन्हीं यादों के गलियारों में कुछ ढूंढने निकल पड़ता है। शायद दस बरस हो गया होगा न ?•••

सुबह का समय काफी हड़बड़ी और व्यास्तता से भरा हुआ करता है। जिंदगी की आपाधापी को खामियांँ ही कह लिजिए कि, हमें सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती। बस स्टैंड पर समय से कुछ पहले पहुंच कर थोड़ी गहरी सांस लेना, फिर इधर-उधर नज़रें फिराना सबकुछ ठीक ठाक तो है ना ?

यह मेरी अदब में शुमार था।

घर से बस स्टैंड तक रास्ते में कुछ दरख़्त

सुर्ख लाल सफेद पीले मौसमी फूलों की मदमस्त खुशबू ,

कुछ जंगली पौधों की कच्ची महक,

सूखे पत्तों की सरसराहट

कुछ जानवर,

और स्टैंड पर लगे हुए बिल होर्डिंग्स सभी को हाय हॅलो नज़रों से कह दिया करती थी।

लगता सभी मेरी राह देखा करते हैं। शायद देखते भी हो!

सुबह-सुबह सभी बस स्टैंड पर अपनी अपनी मंजिल तय करने के लिए बेसब्री से साधनों का इंतजार करना आम बात है। यह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है।

मेरे साथ शायद बहुतों की भी।

एक दुसरे से पहचान सिर्फ एक हल्की-सी मुस्कान तक ही सीमित था। इससे ज्यादा सरोकार किसी से किसी को नहीं। हर कोई भागा -भागा सा।

निगाहें अपनी अपनी साधनों और घड़ी की सूइयों की निगरानी में व्यस्त।

स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों के पेरेंट्स भी उस दौड़-भाग का हिस्सा होते।

ऐसा लगता है कि समय ने सभी को कठपुतली की तरह बांध दिया है।

मेरे और उसके बस की टाइमिंग्स भी आगे-पीछे ही थे।

मेरी पहले आती और उसकी बाद में।

बस एक रिश्ता था हल्की-सी मुस्कान का।

हम एक-दूसरे को गुड मॉर्निंग बोल लेते थे मुस्कान के जरिए बस। क्योंकि इससे ज्यादा समय किसी के पास नहीं था।

हर रोज एक क्षणिक मुलाकात की आदत सी हो गई थी उसके साथ।

कोशिश करती की बस चढ़ कर उसे टाटा करुं, वो भी कोशिश करता ऐसा ही कुछ करने के लिए।

कुछ एक लंबे अरसे तक यही सिलसिला जारी रहा।

लेकिन एक दिन बिना कुछ बताए यह सिलसिला टूट जाता है।

हुआ यूं कि, मेरे बस की टाइमिंग बदल गई।

बस स्टैंड पर उसकी कमी महसूस होती रही।

सबकुछ तो ठहरा सा है। अपने अपने जगह पर है। फिर क्यों मन अशांत है ?
कभी कभी हमें अपने जीवन में बहुत से चीजों की आदत सी हो जाती है।

जिसके बिना सबकुछ अधूरा सा लगने लगता है और फिर उसके ना होने या ना मिलने पर हम सोचने लगते हैं।
उन कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते क्योंकि न तो वो खून के रिश्ते होते हैं ना तो वो रिश्तेदार होते है।

वो आंखों से जन्मे और दिल से बंधे होते हैं।

इसका एहसास मुझे तब हुआ जब एक दिन अचानक मेरी और उसकी बस की टाइमिंग एक दिन के लिए फिर से एक हो गई । मैं आदतन हमेशा की तरह बस-स्टैंडड पर गहरी सांँस लेते हुए आसपास की दुनिया की जायज़ ले ही रही थी कि अचानक उस पर नज़र पड़ती है। वही नीली आंखें, भूरे बाल, फुल यूनीफार्म में हमेशा की तरह प्यारा सा।

पहली बार उस दिन लगा बस थोड़ी लेट हो जाता तो अच्छा होता। उसकी नज़र ने भी मुझे देख लिया था।

अचानक वह अपने बैग से कलम कागज निकाल झटपट कुछ लिखने लगा।

यह ख्याल फिर कब मुलाकात हो या न हो शायद उसके जेहन में भी यह दस्तक दे चुकी थी।

वह पहली बार दौड़ते हुए मेरे करीब आया था और एक कागज़ का टुकड़ा मुझे थमा गया था और,

हाथों से बाय का इशारा करते हुए अपनी बस में चढ़ गया।
मैं भी कागज़ मुट्ठी में बंद कर अपनी बस पर चढ़ जाती हूं।
बस अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाती है।

गहरी ज्ञसांस लेते हुए मैं सीट पर बैठ बड़ी आतुरता से कागज़ के टुकड़े को खोलती हूं ।
पढ़ने के बाद अंदर जो अनुभूति हुई उसका शब्दों में बयान करना शायद मुश्किल है।

बहुत प्यार भरा बड़े-बड़े आड़े तिरछे अक्षरों में लिखा था….
Missed you……
Avi
Class – lll
आज पुरानी डायरी खोली तो वो कागज़ का टुकड़ा दबा मिला।
एक हल्की-सी मुस्कान देने के बदले में जो उपहार मुझे मिला था, वो अवर्णनीय है। सचमुच कुछ रिश्तों को हम अपने यादों में रखकर भी निभाते हैं। जैसे मेरे और उस छोटे से अधिक का रिश्ता।

जहाँ रहना खुश रहना सदा। बस एक दुआ मेरे होंठ बुदबुदा रहे थे और एक हल्की-सी मुस्कान के साथ मेरी खामोश आंखें आज भी उसे देख पा रही थीं। बस मन निरूत्तर नि:शब्द सा था •••

-अपर्णा विश्वनाथ

2 thoughts on “मिस्ड यू****

  1. अहसास भावनाओं का वह सैलाब है जिसकी अभिव्यक्ति शायद कभी-कभी कर पाना मुमकीन नहीं होता

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